हिमालय की गोद से
बहुत खुबसूरत है आशियाना मेरा ,है यही स्वर्ग मेरा,मेरु मुलुक मेरु देश
Friday, July 29, 2022
Wednesday, July 27, 2022
हेलंग
हेलंग
कटण वळौंन
क्य क्या नि काटि दुन्या मा
कैन डालि बोटि काटि
कैन सदनि मुण काटि
वेकी जु जरा सी उठी माथ
क्वी क्वी त पैली बटि उस्ताज रैं
सदनि कटणा मा हैंका जैड
कैकु जिन्दग्या् सफर कटै ग्याई
सदनि हैंका कटै मा
त कैन कन्न कन्ना दिन कटिन
कटिन कन्न कन्न उकाळ
ईं आश मा कि
कब्बि त खुलली या रात
कब्बि त व्होली सुबेर
कैन सर्या जिंदगी काटि मौज मा
ईं सुन्दर धर्ती तैं छलणी बणैकि
धैरिक डाम हैंका जिकुड़ी मा
यूँ डाँड़ियूँ- काँठीयूँ तैं खरमंड्या बणैकि
कै ग्यीं नीलाम लगैकि मवासी घाम
हे राम दा !
नि काट सकदि बल
अपडा ही पाड़
अपडा ही डाँडा बटि
अपडा ही हेलंग मा
एक पुल घास
त बस वा बिचरि
जैन सदनि काटि पाड़
दुःख अर खैरि को
अर जैंक काँधियूँ मा टिक्यूँ
अज्यूँ तलक बि मुण्ड उठैकि
खड़ो हुयूँ शान से
हमारो यो पाड़
© गीतेश नेगी
Tuesday, February 2, 2021
भासौ गधा अर साहित्यिक चकड़ैत
गढ़वाळि व्यंग्य
गीतेश नेगी
गधा मानै दुन्यौ सब चुलै मिनती प्राणीयूँ बटि एक सीधो, शरीफ,समभाव सुभौ वळो एक खास प्राणी जै मा ना क्वी लालच,ना क्वी गुस्सा ना क्वी रिस , ना कै से क्वी शिकैत ,सदानि सब्बियूँ दगड़ि एकसार।
सादगी इन्नी कि माटो खाणो माटो लाणौ। भै गुणों मा गधा संतो अर रिसी मुनियों से कम थोड़ी च कखि । फरक ज्ञान को ही त होलु जरा।
सदानि मीनत -मजूरी कैकि खाण वळो गधा प्रति दुन्यौ ज्ञानी ,ध्यानी विद्वानों सोच सदानि बुरी रै। मिनत मजूरी गधा करदु रै अर मौज सदानि मालिकै रै। दुन्या मा सब चुलै जादा अत्याचार अगर कै दगड़ि ह्वे त वो गधा दगड़ि ही ह्वे। हालात ई छन कि जुग - जुग बटि मनखि सेवा कन्न वळा गधा आज तक बि कुटबाग ही सुणणा, भल्लु कैकि बि बुरो ही बणयाँ। आज बि अनपढ़ त छोड़ा, बड़ा- बड़ा विद्वान तक बि इन्ना बेकूफ़ आदिम तैं गधै संज्ञा देकि सम्मानित करदन। गधा हाड़ तोड़ मेनतै बाद बि अपड़ि पछ्याण नि बणै सकणा मल्लब आइडेंटिटी आफतौ इन्नी मुकाबला कन्ना, जन्न हम गढ़वळि अपड़ि भाषा अर पछ्याण वास्ता कन्ना। मिनत गधा कन्ना अर मौज क्वी हौरि कन्ना। एक गधा ही इन्न च जै तैं ना नौ नामै फिकर ना मान सम्मानै, वे तैं फिकर च त बस काम कन्नै। इलै ही गधा गधा च। अगर इन्नो नि होन्दू त दुन्या मा आज गधाै बि बड़ो नौ अर हाम हूंदी,वो विद्वान या एक संत या हौरि कुछ नि त एक या बडो साहित्यकार त ह्वे ही सक्द छाई।
गधाैं परचौ वेद,पुराण,ब्राह्मण ग्रंथ उपनिषद से लेकि बाइबिल तक सब्बि जग्गा मिलदु। आज साहित्य मा गधाैं तैं क्वी खास आदर सम्मान भले नि मिलणु हो पर एक बगत छाई जब साहित्य मा गधाैं खूब हाम छाई। क्या पिरेमचंद क्या अज्ञेय क्या वर्डसवर्थ सब्बि गधा गुण प्रेमी रैं। कृश्न चन्दर त इतगा मेरबान रैं गधाैं परैं कि वोंन 'एक गधा की आत्मकथा' अर फिर 'एक गधा नेफा में' ही लिखी दे। 'एक गधे का ब्याह ' तकै नाटिक लिखे ग्यीं पर बिचारा गधा आज बि वो सम्मान नि पै सका जैका वो असल हकदार छाई। आज बि समाज मा कैकि बेज्जती कन्नी हो या कै त गिरोणा छवीं हो , कै परैं अपड़ि खिज्ज उतरणी हो सब चुलै बढ़िया संज्ञा गधा ही च। बस वे तैं गधा बणै द्यावा। आदमि त मिंटो मा गधा घोषित ह्वे सकद। पर भै कुछ त बात च यों गधाैं मा जो बड़ा - बड़ा अर मैंगा घ्वाड़ों मा बि नि।
घ्वाड़ों कॉन्फिडेंस कम ह्वे सकद,वो खिज्जै सक्दिन,जल्कि सक्दिन, यादाश्त जबाब देंण परैं वो बिरडी सक्दिन पर गधा कामै भारी खैरियूँ बाद बि, दुन्या बेदर्दी अर अत्याचार सैणा बाद बि मजाल क्या जो खिज्जै जा कब्बि, जल्कि जा या बाटो बिरडी जा कब्बि। मनखि कंदूड को काचो ह्वे सकद पर गधा ना। मीलों दूर बटि बि अपडा लोगों बात साफ सुणि बिंगी दिंद यो गधा । जिन्दग्या खतरनाक बाटा मा ज्ञानी से ज्ञानी मनखि बि मिंटो मा रिस्ता बिसरी बाटा बिरडी जांद पर यो गधा देखा 10 साल या 20 साल नि पूरा 30 साल तकै बि नि बिसरदो। वो घ्वाड़ों जन्न उकाल काटिक सरबट बि नि करदो। हां गधा ज़रा ढीठ जरूर होन्दू , वो जल्दी कै पर भरोसू नि करदो पर जब करदु त आखिर सांस तक पुरो दगड़ू निभौंन्द। आज यख भोल वख वेक सुभौ मा नि।
दुन्या मा गधा सदानि काम पर लग्यां रैं ,राजपाटै क्रेडिट अश्वमेघि घ्वाड़ा लिंदा रैं, पूजा गौ - ब्ळदो अर नागों होंदी रै पर निर्भगी ये गधा जोग सदानि गाली ही लिखीं रैं।
साहित्य मा अज्जकाल एकदा फिर गधाैं खूब जिक्र होणु पर वख बि भासै गधाैं पर चर्चा कख हुणी। भाषा विमर्श कन्न वलों तैं कुछ अतिविद्वान गधा घोषित कैरिक अपडो बढ़िया साहित्यिक परचौ दिणा। माँ सरसुती इन्ना कलमकारों तैं यों गधाैं जन्न कर्मठता अर समर्पण दियाँ।हालांकि यो वूंकि चिर - परिचित शैली या आदत बि ह्वे सकद या फिर वो गधा पिरेमि बि ह्वे सक्दिन। फिर्बी या बड़ा दुख की बात च कि अज्जकाल गधा भासा विमर्श कन्ना अर कुछ विद्वान साहित्यकार गधाैं पर चर्चा कन्ना।
इन्ना ज्ञानी लोग हालाँकि गधा जन्न शरीफ,शान्त, समझदार नि होन्दन । जादातर गुसैल,हंकारी अर अति आत्ममुग्धता रोग से पीड़ित रैन्दी फिर्बी अपडा शब्द ना ना सब्द कौशल से वो मिंटो मा आदिम तैं गधा अर गधा तैं विद्वान घोषित कन्न मा उस्ताज होंदीन।
प्रभु आपै कृपन ब्याले विद्वान आजै गधा ह्वे सक्दिन अर आजै गधा भोळै विद्वान घोषित ह्वे सक्दिन। क्वी बात नि ईं मतलबी दुन्या मा त लोगबाग काम आण पर गधा तैं बुबा तक बणै दिदीं।
प्रभु अगर आपै चरण धर्ती मा होन्दन त मीन छोडणा नि छाई पर वो त हव्वा मा ...।
खैर जबरजस्ती खुट्टा खींचिक मिलणो बि क्या ? बिगैर बात कैको बि सुद्दी तिरशंकु बणै बि क्या फैदा?
गढ़वळि भासा साहित्य मा बि अज्जकाल गधाैं फुल्ल डिमाण्ड च पर सर्या दिक्कत भासै च। गधा साहित्यिक भासा नि जणदो अर साहित्यकार यों भासाप्रेमी गधाैं भासा। साहित्य अकादमी अर भासा संस्थाओं तैं गधाैं तैं लिख्वारों अर लिख्वारों तैं गधाैं भासा सिखाणै कोसिस कन्न चैन्द। परम ज्ञानी लोगों तैं समझण चैन्द कि जतगा जरोरत 21 फरबरी तैं अंतरराष्ट्रीय मातृभासा दिवस मनाणै च उतगा ही 8 मई खुण विश्व गधा दिवस मनाणै बि च।
भासै गधाैं अर साहित्यिक ज्ञानियूँ बीच क्या पता एक दिन छवीं बत्थ लगण से हमरि भासौ संकट अर गधाैं आइडेंटिटी क्राइसिस द्वी खत्म ह्वे जौ। चला ये बाना भासै गधाैं अर साहित्यिक चकडेतौं मुखाभेंट बि ह्वे जैली ।
बोला क्या विचार च, मिलदा छौ फिर 21 फरबरी तैं -अंतररास्ट्रीय मातृभासा दिवस परैं।
Sunday, January 24, 2021
भिखारी
भिखारी
Tuesday, January 19, 2021
Tuesday, January 5, 2021
हे परमेश्वरा !
हे परमेश्वरा !
मि देखणु छौं
सम्सूत घनघोर सर्द रातियूं मा
सडकै तीर जड्डल थथरौंद मनखि तैं
भूखल बिबलौंद एक मोरण्या शरील तैं
जु कुछ नि चांदू
हे परमेश्वरा !
त्वे से
सिवा एक गफ्फा का
मि देखणु छौं
घुण्डों सार
जिंदगी हिसोरद
वे नौना तैं
जैकी मुखडी परैं
बगतै खोट निशान
हे परमेश्वरा !
अब भारी पोड़ण बैठी ग्यीं
वेकि बालापन्नै हैंसी पर
मि देखणु छौं
वीं निर्भगी ज्वान छोरी तैं
ज्वा साखियूँ बटि दिणी
अग्निपरीक्षा दुन्या सामणि
दौ पर दौ खेले जाणा छन
जैंकि लाज परैं
अर बाच जैंकि
दबै जाणि
पौरुष अहम से
हे परमेश्वरा !
ये समाज का
मि देखणु छौं
वा आग
ज्वा भभरौणी
जिकुड़ा मा वेकि
जैतैं डमाणा रैं लोग
हे परमेश्वरा !
सदानि कमजोर समझिक
मुछ्यालोंन
मि देखणु छौं
फूल माला पैरद-पैरान्द
सम्मानित हूंद-करद
मनै वो चोर तैं
ज्यू अलझयूँ च
अज्यूँ तलक बि
मिथ्या फेर मा
हे परमेश्वरा !
मुण नक्क नकन्यैकि
मि देखणु छौं
आखिर साँस लेकि
छट्ट प्राण छोड़द
वे शाश्वत सच तैं
जैकी गौळी मिलजुलिक
दबै सदानि दुन्यै झूठन
हे परमेश्वरा !
तेरि सौं खै खैकि
मि देखणु छौं
आदिमैं साखियूँ खैरि
दुख अर पीडै पाड
अस्धरियूँ समोदर
हे परमेश्वरा !
चौतर्फ पसरयाँ
आसै रूखा रेगिस्तान मा
मि देखणु छौं
आँखि बुजिक
शान्तचित्त व्हेकि
अब अफ़्फ़ु तैं
हे परमेश्वरा !
चौतर्फ घनघोर
अन्ध्यरु व्हेगी
अब मैं कुछ नि दिखेंणु
मैं बि ना
सिर्फ दिखेंणु छै
चौछवडि अब
तू ही तू
हे परमेश्वरा !
- गीतेश सिंह नेगी
Sunday, January 3, 2021
प्रीतम सतसई
गढ़वाळि लोकसाहित्य मर्मज्ञ अर भाषा साहित्यै पछ्याण आदरणीय भैजी डा0 प्रीतम अपछ्याण जीक सद्य प्रकाशित पोथि 'प्रीतम सतसई' (गढ़वाळि दोहा संग्रै) मिली। डा0 प्रीतम अपछ्याण जी गढ़वाळि का जण्या मण्या साहित्य सेवक,साधक छन। चकोर ,उमर बुण्दि जा ,ध्वनियों के शिखर,मेरी रचना,गाँव के बयान अर प्रीतम सतसई भाषा साहित्य अर संस्कृति प्रेमियूं खुण आपै साहित्यिक साधनौ प्रसाद छन ।
आपै गढ़वाळि कथा संग्रै, गढ़वाळि उपन्यास,गढ़वाळि गीत संग्रै, शोध प्रबंध जन्न कतगे हौरि ग्रंथ प्रकाशन की जग्वाळ मा छन।
दोहा छंद भारतीय साहित्य परम्परा मा भौत खास, गागर मा सागर भोरणै सक्या रखण वळा अर तंत मनै जांदिन। सूर, कबीर,तुलसी आदि अर गढ़वाळि मा भजन सिंह 'सिंह' (सिंह सतसई) ,अबोधबन्धु बहुगुणा(तिड़का),कन्हैयालाल डंडरियाल (नागरजा भाग1,2,3,4 ),भगवती प्रसाद जोशी 'हिमवन्तवासी' जी (सीता बणवास) जन्न जण्या मण्या कवियों दगड़ि हौरि बि कवियोंन दोहा छंद मा लोकप्रिय रचना रंचीं।
उन्नीस विषयों परैं सुमरीं ,हिंदी भावानुवाद दगड़ि सात सौ तिरानब्बे दोहों से सजीं , हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट बटि प्रकाशित 180 पेज की 'प्रीतम सतसई' गढ़वाळि साहित्य प्रेमियूं वास्ता इलै बि खास च कि सतसई परम्परा मा या भग्यान भजन सिंह 'सिंह ' जीक ' सिंह सतसई' बाद दूसरी ऐतिहासिक सतसई च।
उन्न त दोहा पढ़ण समझण मा सरल होन्दन पर असल मा यो द्वी लैना चार चरणों मा कवि का जीवन दर्शन अर तजुर्बै पूँजी को सार होन्दन।
कविता,गीत, गजल अर गद्य मा प्रीतम जीक सल्ल -सगोर अर लेख्वारि मिजाज से हम सब्बि भल्लि कै परिचित छौ ।
दोहा छंद मा बि प्रीतम जीक साधना गैरे को अन्ताज ,प्रत्यक्षम किम् प्रमाणम् ढंग से एक दोहा तैं देखिक ही उजागर व्हेय जांद :
जीवन की ईं चक्कि मा, मिन पीसे दिन रात
ल्वे छौंकी की दाळ अर,आँसु उमाळी भात।
ईं ऐतिहासिक सतसई मा प्रीतम जीक इन्ना इन्ना सात सौ तिरानब्बे दोहा रच्याँ छन । गढ़वाळि भाषा साहित्य प्रेमियूं वास्ता 'प्रीतम सतसई ' एक खास साहित्यिक धरोहर जन्न च। हिंदी भावानुवाद से पोथि हौरि बि असरदार बणि ग्याई।
ईं पोथि तैं ग्वालदम कि हिवांली काँठीयूँ कि वीं पवेतर धर्ती बटि अरब सागर का ये छोर तापी का पावन छाल तक इतगा दूर मि तलक सप्रेम पहुंचाणा वास्ता मि आदरणीय प्रीतम अपछ्याण भैजी को ह्रदय से आभार व्यक्त करदु अर माँ सरसुती अर माँ नंदा जीक इन्नी कृपा आप परैं सदानि बणि रौ ईं मंगलकामना प्रार्थना करदु।
बाकी जल्द फैलास कैकि
गीतेश सिंह नेगी