हिमालय की गोद से

हिमालय  की  गोद  से
बहुत खुबसूरत है आशियाना मेरा ,है यही स्वर्ग मेरा,मेरु मुलुक मेरु देश

Friday, July 29, 2022

शून्य

शून्य का  अर्थ
शून्य नही होता
नही होता समाप्त
सब कुछ 
आकर इस जगह
शून्य आरंभ है
शून्य प्रारंभ है
शून्य का अर्थ
शून्य नही होता !

©®  गीतेश नेगी

खोज

कुछ चीजों को खोजते खोजते
कई बार हम खुद खो जाते हैं 

©® गीतेश नेगी

Wednesday, July 27, 2022

हेलंग

 हेलंग


कटण वळौंन

क्य क्या नि काटि दुन्या मा  

कैन डालि बोटि काटि

कैन सदनि मुण काटि

वेकी जु जरा सी उठी माथ 

क्वी क्वी त पैली बटि उस्ताज रैं

सदनि कटणा मा हैंका जैड 

कैकु जिन्दग्या् सफर कटै ग्याई 

सदनि हैंका कटै मा

त कैन कन्न कन्ना दिन कटिन

कटिन कन्न कन्न उकाळ 

ईं आश मा कि 

कब्बि त खुलली या रात

कब्बि त व्होली सुबेर 

कैन सर्या जिंदगी काटि मौज मा

ईं सुन्दर धर्ती तैं छलणी बणैकि

धैरिक डाम हैंका जिकुड़ी मा

यूँ डाँड़ियूँ- काँठीयूँ  तैं खरमंड्या बणैकि

कै ग्यीं नीलाम लगैकि मवासी घाम 

हे राम दा ! 

नि काट सकदि बल

अपडा ही पाड़ 

अपडा ही डाँडा बटि

अपडा ही हेलंग मा 

एक पुल घास

त बस वा बिचरि 

जैन सदनि काटि पाड़

दुःख अर खैरि को

अर जैंक काँधियूँ मा टिक्यूँ

अज्यूँ तलक बि मुण्ड उठैकि 

खड़ो हुयूँ शान से

हमारो यो पाड़


© गीतेश नेगी

Tuesday, February 2, 2021

भासौ गधा अर साहित्यिक चकड़ैत

 गढ़वाळि व्यंग्य 

गीतेश नेगी


 गधा मानै दुन्यौ सब चुलै मिनती प्राणीयूँ बटि एक  सीधो, शरीफ,समभाव सुभौ वळो एक खास प्राणी जै मा ना क्वी लालच,ना क्वी गुस्सा ना क्वी रिस , ना कै से क्वी शिकैत ,सदानि सब्बियूँ दगड़ि एकसार।


 सादगी इन्नी कि माटो खाणो माटो लाणौ। भै गुणों मा गधा  संतो अर रिसी मुनियों से कम थोड़ी च कखि । फरक ज्ञान को ही त होलु जरा। 


   सदानि मीनत -मजूरी कैकि खाण  वळो गधा प्रति दुन्यौ ज्ञानी ,ध्यानी विद्वानों सोच सदानि बुरी रै। मिनत मजूरी गधा करदु रै अर मौज सदानि मालिकै  रै। दुन्या मा सब चुलै जादा अत्याचार अगर कै दगड़ि ह्वे त वो गधा दगड़ि ही ह्वे। हालात ई छन कि जुग - जुग बटि मनखि सेवा कन्न वळा गधा आज तक बि कुटबाग ही सुणणा, भल्लु कैकि बि बुरो ही बणयाँ। आज बि अनपढ़ त छोड़ा, बड़ा- बड़ा विद्वान तक बि इन्ना बेकूफ़ आदिम तैं गधै संज्ञा देकि सम्मानित करदन। गधा हाड़ तोड़ मेनतै बाद बि अपड़ि पछ्याण नि बणै सकणा मल्लब  आइडेंटिटी आफतौ इन्नी मुकाबला कन्ना, जन्न हम गढ़वळि अपड़ि भाषा अर पछ्याण वास्ता कन्ना। मिनत गधा कन्ना अर मौज क्वी हौरि कन्ना।  एक गधा ही इन्न   च जै तैं ना नौ नामै फिकर ना मान सम्मानै, वे तैं फिकर च त बस काम कन्नै। इलै ही गधा गधा च। अगर इन्नो नि होन्दू त दुन्या मा आज गधाै बि बड़ो नौ अर  हाम हूंदी,वो विद्वान  या एक संत या हौरि कुछ नि त एक या बडो साहित्यकार त ह्वे ही सक्द छाई। 


गधाैं परचौ वेद,पुराण,ब्राह्मण ग्रंथ उपनिषद से लेकि बाइबिल तक सब्बि जग्गा मिलदु। आज साहित्य मा गधाैं  तैं क्वी खास आदर सम्मान भले नि मिलणु हो पर एक बगत छाई जब साहित्य मा गधाैं  खूब हाम छाई। क्या पिरेमचंद क्या अज्ञेय क्या वर्डसवर्थ सब्बि गधा गुण प्रेमी रैं। कृश्न चन्दर त इतगा  मेरबान रैं गधाैं परैं कि वोंन 'एक गधा की आत्मकथा'  अर फिर 'एक गधा नेफा में'  ही लिखी दे। 'एक गधे का ब्याह ' तकै नाटिक लिखे ग्यीं पर बिचारा गधा आज बि वो सम्मान नि पै सका जैका वो असल हकदार छाई। आज बि समाज मा कैकि बेज्जती कन्नी हो या कै त गिरोणा छवीं हो , कै परैं अपड़ि खिज्ज उतरणी हो सब चुलै बढ़िया संज्ञा गधा ही च। बस वे तैं गधा बणै द्यावा। आदमि त मिंटो मा गधा घोषित ह्वे सकद। पर भै कुछ त बात च यों गधाैं  मा जो बड़ा - बड़ा अर मैंगा घ्वाड़ों मा बि नि।


 घ्वाड़ों कॉन्फिडेंस कम ह्वे सकद,वो खिज्जै सक्दिन,जल्कि सक्दिन, यादाश्त जबाब देंण परैं  वो बिरडी सक्दिन पर गधा कामै भारी खैरियूँ बाद बि, दुन्या बेदर्दी अर अत्याचार सैणा बाद बि मजाल क्या जो खिज्जै जा कब्बि, जल्कि जा या बाटो बिरडी जा कब्बि। मनखि कंदूड को काचो ह्वे सकद पर गधा ना। मीलों दूर बटि बि अपडा लोगों बात साफ सुणि बिंगी दिंद यो गधा । जिन्दग्या खतरनाक बाटा मा ज्ञानी से ज्ञानी मनखि बि मिंटो मा रिस्ता बिसरी बाटा बिरडी जांद पर यो गधा देखा 10 साल या 20 साल नि पूरा 30 साल तकै बि नि बिसरदो। वो घ्वाड़ों जन्न उकाल काटिक सरबट बि नि करदो। हां गधा ज़रा ढीठ जरूर होन्दू , वो जल्दी कै पर भरोसू नि करदो पर जब करदु त आखिर सांस तक पुरो दगड़ू निभौंन्द। आज यख भोल वख वेक सुभौ मा नि। 


दुन्या मा गधा सदानि काम पर लग्यां रैं ,राजपाटै क्रेडिट अश्वमेघि घ्वाड़ा लिंदा रैं, पूजा गौ - ब्ळदो अर नागों होंदी रै पर निर्भगी ये गधा जोग सदानि गाली ही लिखीं रैं। 


साहित्य मा अज्जकाल एकदा फिर गधाैं खूब जिक्र होणु पर वख बि भासै गधाैं  पर चर्चा कख हुणी। भाषा विमर्श कन्न वलों तैं कुछ अतिविद्वान गधा घोषित कैरिक अपडो बढ़िया साहित्यिक परचौ दिणा। माँ सरसुती इन्ना कलमकारों तैं यों गधाैं जन्न कर्मठता अर समर्पण दियाँ।हालांकि यो वूंकि चिर - परिचित शैली या आदत बि ह्वे सकद या फिर वो गधा पिरेमि बि ह्वे सक्दिन। फिर्बी या बड़ा दुख की बात च कि अज्जकाल गधा भासा विमर्श कन्ना अर कुछ विद्वान साहित्यकार गधाैं पर चर्चा कन्ना। 

इन्ना ज्ञानी लोग हालाँकि गधा  जन्न शरीफ,शान्त, समझदार नि होन्दन । जादातर गुसैल,हंकारी अर अति आत्ममुग्धता रोग से पीड़ित रैन्दी फिर्बी अपडा शब्द ना ना सब्द कौशल से वो मिंटो मा आदिम तैं गधा अर गधा तैं विद्वान घोषित कन्न मा उस्ताज होंदीन। 


प्रभु आपै कृपन ब्याले विद्वान आजै गधा ह्वे सक्दिन अर आजै गधा भोळै विद्वान घोषित ह्वे सक्दिन। क्वी बात नि  ईं मतलबी दुन्या मा त लोगबाग काम आण पर गधा तैं बुबा तक बणै दिदीं।


 प्रभु अगर आपै चरण धर्ती मा होन्दन त मीन छोडणा नि छाई पर वो त हव्वा मा ...।


  खैर जबरजस्ती खुट्टा खींचिक मिलणो बि क्या ?  बिगैर बात  कैको बि सुद्दी तिरशंकु बणै बि क्या फैदा?   


गढ़वळि भासा साहित्य मा बि अज्जकाल गधाैं फुल्ल डिमाण्ड च पर सर्या दिक्कत भासै च। गधा साहित्यिक भासा नि जणदो अर साहित्यकार यों भासाप्रेमी गधाैं  भासा। साहित्य अकादमी अर भासा संस्थाओं तैं गधाैं तैं लिख्वारों अर लिख्वारों तैं गधाैं  भासा सिखाणै कोसिस कन्न चैन्द। परम ज्ञानी लोगों तैं समझण चैन्द कि जतगा जरोरत 21 फरबरी तैं अंतरराष्ट्रीय मातृभासा दिवस मनाणै च उतगा ही 8 मई खुण विश्व गधा दिवस मनाणै बि च। 


 भासै गधाैं अर साहित्यिक ज्ञानियूँ बीच क्या पता एक दिन छवीं बत्थ लगण से हमरि भासौ संकट अर गधाैं आइडेंटिटी क्राइसिस द्वी खत्म ह्वे जौ। चला ये बाना भासै गधाैं अर साहित्यिक चकडेतौं मुखाभेंट बि ह्वे जैली ।


 बोला क्या विचार च, मिलदा छौ फिर 21 फरबरी तैं -अंतररास्ट्रीय मातृभासा दिवस परैं।

Sunday, January 24, 2021

भिखारी

 भिखारी


मि !
एक भिखारी सी
खडू छौं 
जिन्दग्यो दुबाटों मा
आज फिर 
घंगतोळ मा

लगै याल मिल
अपड़ि सर्या मेनत
सर्या तागत 
अपड़ि सर्या जमा पूंजी
हिटणा मा ये रस्ता फर 
जैमा नि मिळणु 
दूर तलक 
क्वी सूद-भेद बि 

 सर्या जिंदगी हिटणै बाद बि
 ईं अनंत जात्रा मा
 मि खडू छौं अब्बि बि
 शून्य परैं ही 
 एक भिखारी सी 
  
क्या भूल ह्वे व्होलि
कख व्हेय व्होलि चूक
इन्न लगद मि जन्न
हिटदु रौं सदानि 
उल्टैं छोड़
अफ़्फ़ु बटि ही दूर
भौत दूर


अब हिटण पोडलु 
अपण तर्फां ही
अन्धयरोंं मा बि
अगर भेटणु च अफ़्फ़ु तैं
वे उदंकार तैं
वे विराट ब्रह्म तैं
सब कुछ तैं

पर येका वास्ता 
कटण पोडला पैली
जाल वूंं जंजीरों का
जैमा बंधी रै
कश्ती जिन्दग्यी 
खड़ी समोदर छाल
अर मि चलाणु रौं
सुद्दी चप्पू
लाटू सी 
 

छोडिक पागलपन
विचारौं- सब्द वाणी को 
सधण पोडलु वे तैं 
जो च निसब्द 
लगाण पोडली समाधि अब 
वे मौन कि 
जो काटि देलु
भैर बटि 
अर जोड़ देलू 
भित्र  मितैं

फिर समणि मौतै बि
ह्वे जौलु मौन 
बणिक एक महायोगी 

जैमा च सब कुछ 
वू बि जैंतैं अब
नि लुछी सक्दि
यख तलक कि
 मौत बि 

©® गीतेश सिंह नेगी

Tuesday, January 19, 2021

 


आखिर कन्नुक्वे बचऽलि मातृभाषा

- गीतेश सिंह नेगी

जब क्वी आदिम कै भाषा विशेष मा नि बच्यान्दो या कै भाषा विशेष तैं नि सम्लौंद त वा भाषा विशेष खत्म ह्वे जांद । ये ही आधार परैं यूनेस्कोन  दुन्यौ भाषाओं तैं , सुरक्षित अर विलुप्त का बीच  ,संकटग्रस्त (Vulnerable),  निश्चित रूप से संकटग्रस्त (Definitely Endangered), भारी  संकटग्रस्त (Severely Endangered) अर गंभीर रूप से संकटग्रस्त  (Critically Endangered) 4 वर्गों मा बाँटी। यूनेस्कोन्  42 भारतीय भाषाओं तैं गंभीर रूप से संकटग्रस्त मानी। 

जनगणना निदेशालय की एक रिपोर्ट बतांद कि भारत मा 22 आधिकारिक भाषा अर तकरीब 100 गैर-आधिकारिक भाषा बोले जांदिन। ये तकनीकी दौर में तकरीबन 42 भाषा इन्नी छन जौंक वजूद खतरा मा च। भले ही यों संकटग्रस्त भाषाओं तैं बोलण बच्याण वळा लोग जादा नि व्होला पर यी भाषा हमरि विराट सांस्कृतिक धरोहर छन।  संयुक्त राष्ट्र द्वारा पैली इन्नी 42 भारतीय भाषा- बोलियों लिस्ट बणैई च, जो खतरा मा छन अर सुरुक सुरुक कै मोरिक खत्म हुन्दा जाणि छन । यो 42 संकटग्रस्त भाषाओं मा 11 अंडमान अर निकोबार द्वीप समूह भाषा छन जौमा ग्रेट अंडमानीज़ , जरावा , लामोंगज़ी , लुरो , मियोत , ओंगे , पु , सनेन्यो , सेंतिलीज़ , शोम्पेन अर तकाहनयिलांग  शामिल छन । मणिपुरै सात भाषा  एमोल , अक्का , कोइरेन , लामगैंग , लैंगरोंग , पुरुम , तराओ , हिमाचळै चार भाषा , बघाती , हंदुरी, पंगवाली  अर सिरमौदी  यों संकटग्रस्त भाषाओं मा शामिल छन। यों संकटग्रस्त भाषाओं मा ओडिशा की मंडा, परजी , पेंगो, कर्नाटकै कोरागा अर कुरुबा , आंध्र प्रदेशै गडाबा अर नैकी , तमिलनाडु की कोटा  ,  टोडा अर असमै तेई नोरा ,तेई रोंग ,  अरुणाचळै मारा, ना , उत्तराखंडै बंगानी, झारखंडै बिरहोर , महाराष्ट्रै निहाली, मेघालयै रुगा अर पश्चिम बंगाळै टोटो शामिल छन।

संविधान की आठवीं सूची का अनुच्छेद 344 (1) और 351 मा राजभाषा हिंदी दगड़ि बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मैतेई (मणिपुरी), मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू आदि 22 भाषाओं तैं आधिकारिक मान्यता दिईं च जबकि अंगिका, बंजारा, बाजिका, भोजपुरी, भोति, भोतिया, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, धातकी, गढ़वाली, गोंडी, गुज्जरी, हो, कच्चाछी, कामतापुरी, कार्बी, खासी, कोडावा (कोरगी), कोक बराक, कुमांयूनी, कुरक, कुरमाली, लीपछा, लिम्बू, मिज़ो (लुशाई), मगही, मुंदरी, नागपुरी, निकोबारीज़, हिमाचली, पाली, राजस्थानी, संबलपुरी/कोसाली, शौरसेनी (प्रकृत), सिरैकी, तेन्यिदी तथा तुल्लू आदि 38 हौरि भाषाओं तैं 8वी अनुसूची मा शामिल कन्नै मांग काफी समय से जोर शोर से संसद मा उठणी च।

भारतीय भाषाओं को लोक सर्वेक्षण का हिसाबन दुन्यौ तकरीबन 4,000 भाषाओं बटि भारतै तकरीब 10% भाषा अगला 50 सालों मा विलुप्त  हुण वळी छन जैमा सब चुलै जादा खतरा तटीय भाषाओं पर च। मतलब भारत मा बोले जाण वळी कुल 780 भाषाओं बटि लगभग 400 भाषा विलुप्त हुण वळी छन। हमरि भाषा सांस्कृतिक अर पारंपरिक ज्ञान की धरोहर छन पर युंकि लगातार समाजिक अर सरकारी उपेक्षा का कारण यी भाषा अब मरणासन्न ह्वेगिन, हर पंदरा दिन मा एक भाषा मोरणी च । एक आदिमै अंतिम संस्कार का दगड़ि एक भाषा बि अंतिम संस्कार हुणु च। २६ जनवरी २०१० खुणी अंडमान द्वीप समूह की ८५ वर्षीया बोआ की मौत का दगड़ि ग्रेट अंडमानी परिवारै भाषा ‘बो’ सदानि का वास्ता खत्म ह्वे ग्याई । नवम्बर २००९ मा बि  बोरो नौ कि महिला  कि मौत दगड़ि ही ‘खोरा’ भाषा को बि अंत ह्वे ग्ये। या सिर्फ एक भाषा ही मौत को सवाल अर पीड़ा नि, यो सवाल छ इतिहास,संस्कृति, क्षेत्र विशेष का भूगोल अर यों से जुड़याँ तथ्य अर ज्ञान का विराट भंडार कि क्षति को। सवाल यो छ कि आखिर यी भाषा खत्म किलै हुईं ?  अंडमान द्वीपै 10 भाषा प्रचलन मा छाई ,आज ई भाषा केवल चार भाषाओं का समूह ‘ग्रेट अंडमानी भाषा’ तक सिकुड़ी रै ग्यीं 6 भाषा समाप्त ह्वेगिन्। 
‘नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी एंड लिविंग टंग्स इंस्टीट्यूट फॉर एंडेंजर्ड लैंग्वेजज’ का हिसाबन  सन् २१०० तक दुन्या कि 7 हजार से भी अधिक भाषा खत्म ह्वे सक्दिन ,युमा लगभग सत्ताईस सौ भाषाएं संकटग्रस्त छन । जैमा असमै 17 भाषा शामिल छन जौमा देवरी,मिसिंग,कछारी,बेइटे,तिवा और कोच राजवंशी सब चुलै संकटग्रस्त भाषा छन। यों भाषाओं का बोलण वळा लगातार कम हुँदा जाणा छन अर नै छवाळि खाली असमिया, हिन्दी अर अंग्रेजी तक सिमटिक रै ग्याई।  २८ हजार लोग देवरी भाषी, मिसिंग भाषी साढ़े पांच लाख अर बेइटे भाषी करीब १९ हजार लोग ही बच्यां छन । असमै बोडो, कार्बो, डिमासा, विष्णुप्रिया, मणिपुरी और काकबरक भाषाओं  का बी इन्नी हाल छन। 

भारत सरकारन वों भाषाओं आंकड़ा संग्रै करिन जौंतैं १० हजार से जादा संख्या मा लोग बोल्दिन। २००१ की जनगणना का आंकड़ा बोल्दिन बल इन्नी १२२ भाषा अर २३४ मातृभाषाएं छन। दुर्भाग्यवश 10  हज़ार से कम बोलण वळौं बोली भाषा ये सर्वेक्षण मा शामिल ही नि ह्वे साकी।

वर्ष 1961 की जनगणना  अनुसार, भारत मा लगभग 1652 भाषा छै अर वर्ष 1971 मा केवल 808 भाषा ही ज्युन्दी रैं।  भारतीय भाषाओं को लोक सर्वेक्षण 2013 का आंकड़ों का हिसाबन, पिछल 50 वर्षों मा तकरीब 220 हौरि भाषा लुप्त ह्वेगिन अर तकरीब 197 भाषाओं तैं लुप्तप्राय रूप मा दर्ज करे ग्याई ।  आखिर मातृभाषाओं पर इथगा बड़ा संकट का क्या कारण छन ? सबसे पैली बात त सरकारे भाषा सर्वेक्षण मा 10,000 से कम बोलण वळा लोगों कि भाषा तैं मान्यता नि देणु च। कम बोल्दरों का हुण से ई रोजगारै भाषा नि बण सकणी छन ,सामाजिक,सांस्कृतिक मूल्यों मा परिवर्तन, व्यक्तिवादी मानसिकता अर समाज से पैली अपडू हित सोचणै प्रवृति का कारण आज ई भाषा मरणासन्न हुईं छन। 

उत्तराखंडौ  परिपेक्ष मा सन 1894 बटि 1928 तक अंग्रेज सिविल अधिकारी जी. ए. ग्रियर्सनन ब्रिटिश काल मा जब पैली बार भारतै 364 भाषा बोलियों को सर्वेक्षण कैरिक 11 ग्रंथो मा प्रकाशित करे ग्ये त हमर गढ़वाळि ,कुमौनी,जौनसारी भाषाओं ब्यौरा ग्रंथ 9 भाग 4 मा नेपाल,हिमाचल,पंजाब, जम्मू अर कश्मीरै भाषाओं दगड़ि  'पहाड़ि भाषाओं' नौ से दर्ज करे ग्ये। आर्य भाषाओं वर्ग की पहाड़ी भाषा तैं पश्चिमी पहाड़ी जैमा नेपाल की खसकुरा मतलब नेपाली भाषा ,मध्य पहाड़ी जैमा गढ़वाल अर कुमौ की गढ़वाळि अर कुमौनी भाषा अर पश्चिमी पहाड़ी जैमा जौनसार बावर,शिमला पहाड़ी क्षेत्र,कुल्लू,मंडी अर सुकेत,चंबा अर पश्चिमी कश्मीरै भाषा शामिल छाई। हालांकि कुछ शोधकर्ता ये वर्गीकरण तैं भाषाई आधार पर ना मानिकी केवल वे दौर की प्रशासनिक सीमारेखाओं का आधार पर मन्दिन पर फिर बि भाषा सर्वेक्षण की पंवाण का अलावा वे दौर मा यो भाषाई अध्ययन अपना आप मा एक ऐतिहासिक कार्य छौ। यों पहाड़ी भाषाओं बटि नेपाली त संविधान कि 8 वी अनुसूची मा शामिल ह्वे ग्ये पर गढ़वाळि ,कुमौनी,जौनसारी भाषा वो सम्मान नि पै साकी जैकी वो हकदार छाई। गढ़वाळि अर कुमौनी भाषा जु कब्बि गर्व से गढ़वाळै पाल राजवंश अर कुमौ का चन्द राजवंश कि राजकाजै भाषा रैं वो आज  यूनेस्कोन दुन्या संकटग्रस्त भाषाओं मा शामिल छन आज रुणपित्ती मुखडी  कैकि अपडा बोल्दरों तैं धै ध्वाडी लगाणि छन।  

सन 1891 का भाषाई सर्वेक्षण मा ब्रिटिश भारत मा मध्य पहाड़ी भाषा बोलण वलों की संख्या तकरीब 11 लाख 7 हज़ार 6 सौ बारा छाई।  वर्ष 2001 की जनगणना का आंकड़ा बोलणा छन कि उत्तराखण्डै तकरीब 85 लाखै आबादी मा 2,106,142 (24.8 %) लोगोंकि मातृभाषा गढ़वाळि अर 1,948,142 (22.9%) लोगोंकि मातृभाषा कुमौनी अर तकरीब 1 लाख (1.3%)  लोगोंकि मातृभाषा जौनसारी रूप मा दर्ज च। हिंदी भाषी लोगों कि संख्या तकरीब 31,83,092 (37.5%) छाई। प्रदेश का 13 जिलों में से 10 पहाड़ी जिलों कि मुख्य भाषा गढ़वाळि कुमौनी ही छाई। 2009 मा जब भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण की शुरुवात ह्वे त गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मिजोरमै भाषाओं परैं सर्वेक्षण कार्य ह्वे । उत्तराखण्डै मातृभाषाओं पर सर्वेक्षण मा कुमाऊंनी, बुक्सारी, थारू, डारमा, थारू, रंग, जौनसारी, जौनपुरी, बंगाणी आदि 13 मातृभाषाओं परैं सर्वेक्षण करे ग्ये। हालांकि अब्बि बि यों भाषाओं का भाषाई स्वरूप अर यों परैं गंभीर अर विस्तृत अध्ययन अर सर्वेक्षणों मा वैज्ञानिकता आदि की जरूरत मैसुश होंदी। ‘भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण’ जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का भाषा सर्वेक्षण का बाद भारत मा एक महत्वपूर्ण अर इतिहासिक कार्य च । ये सर्वेक्षण कि खासियत या छ कि येमा संविधानै आठवीं अनुसूची मा ‘दर्ज भाषाओं, ‘गैर मान्यता प्राप्त भाषाओं’ अर ‘बोलियों’ मा क्वी भेद नि मानिक सब्बि तैं येमा शामिल करे ग्याई। 
येमा तटीय, पहाड़ी, खानाबदोश, द्वीपीय, जंगली, जनजातीय सब्बि भाषाओं तैं दर्ज कन्नै वून्का दस्तावेजीकरण कन्नै भल्ली कोशिश करिं च।
 उत्तराखण्डै 13 भाषाओं गढ़वाली, कुमाऊंनी, राजी, जौनसारी, जाड़, जोहारी, रंग ल्वू,बंगाणी, बुक्साड़ी, मार्छा, रवांल्टी, जौनपुरी, थाडू परैं बढ़िया जानकारी संग्रहित च। आज यों भाषाओं मा लिखण बोलण वळौं  संख्या अर भविष्यै संकेत चुनौति सब येमा शामिल छन। सर्वेक्षण से जानकरी मिलद कि राजी भाषा तैं बोलण वळा अब 600 से बि कम लोग बच्यां छन। 

यूनेस्को लिस्ट मा गढ़वाली अर कुमाउनी तैं संकटग्रस्त या असुरक्षित श्रेणी मा शामिल करयूं च  मतलब जादातर नौना यों भाषाओं तैं बोल त सक्दिन पर केवल कुछ खास जगा जन्न कि अपडा घार मा ही। जौनसारी तैं निश्चित रूप से खतरा  मा मने ग्याई मतलब नौना अपड़ि मातृभाषा रूप मा ईं भाषा को अब प्रयोग नि करि सकणा ।

गढ़वाळि कुमौनी या हमरि हौरि मातृभाषाओं तैं संकटग्रस्त भाषाओं मा आण से कन्नुक्वे रोके जाव या हमरि जु भाषा संकटग्रस्त श्रेणी मा छन वो तैं कन्नुक्वे संरक्षित करे जाव , वूंंक संवर्धन कन्नुक्वे करे जाव ये अहम मसला परैं एक सुनियोजित कार्ययोजना अर क्रियान्वयन को स्पष्ट एजेन्डा सब्बि  भाषा का निबत काम कन्न वळी संस्थाओं,बुद्विजीवियों अर भाषा साहित्य प्रेमियूं तैं बगत रैन्द कन्नै सख्त जरूरत च।आखिर इन्नी क्या कार्ययोजना हो ज्यां से हमरि सब्बि भाषा एक विरासतैं रूप मा ज्युन्दा जगदा रूप मा हम अपड़ि नै पीढ़ी तक पहुँचे सकों ?

भाषाई विमर्श का मूल बटि जलमी वूंं सब्बि संस्थाओं तैं जु दशकों बटि भाषाई मुद्दा तै लेकि सक्रिय रै,पूरी ऊर्जा पुरी सक्या का दगड़ि धरू धरों मा,स्युसी बैजरो ,पिथौरागढ ,नैनीताल , धुमाकोट ,रुद्रप्रयाग, जूशीमठ, चमोली,अगस्तमुनि  , परसुंडाखाळ , पौड़ी,अल्मोड़ा,उत्तरकाशी,
रिखणीखाळ,कोटद्वार ,गवाणी से लेकि सुदुर बॉम्बे दिल्ली,कानपुर तक  धाद लगाणा रैं , कुमगढ़ अर दुधबोलिक पहरू बण्या रैं ,भाषै रंत-रैबार , ख़बरसार दिणा रैं, भाषै कलश स्थापित करदा रैं , भाषा साहित्य प्रेमियूं परैं दशकों बटि चिट्ठी दे देकि अंग्वाळ बोटणा रैं हर्बी हर्बी भाषा साहित्य का कारिजों मा हुंगरा दिण से लेकि धै धाद तक मन्ना रैं आज नै ऊर्जा नै सक्या अर नै विचारों दगड़ि एक नै राष्ट्रव्यापी एजेन्डा परैं मिलिक काम कन्नै जरूरत च।  

सवाल यो च कि आज भाषाई संकट अर विमर्श कि दशा दिशा क्या च अर क्या यो विमर्श सै दिशा मा कै तर्कसंगत कार्ययोजना या भाषिक एजेन्डा का हिसाब से चलणु च ?  

व्हेय सकद कि सब्बि भाषा साहित्य प्रेमियूं,संस्थाओं,साहित्यकारों कि पूर्ण समर्पण भाव से भावात्मक रूप से अपड़ि सर्या ताकत ये विमर्श परैं लगाईं हो अर लगाईं बि च जैका वास्ता सब्बि बधै का पात्र छन फिर्बी क्या दशकों कि ईं मेहनत का बाद भाषाई संकट सकारात्मक दिशामा दूर होन्द दिखेंणु च या यों प्रयासों का भाषिक धरातल पर कुछ उत्त्साहजनक नतीजा भाषाई सरोकारों से जलमी/उपजीं संस्थाओं तैं दिखेणा छन्न ? 

क्या भाषा विमर्श अर भाषा प्रचार प्रसार को क्वी ठोस कार्ययोजना या एजेंडा भाषा विमर्श का मूल से जलमी हमरि यो संस्थाओं कि वार्षिक गतिविधियों का कलेण्डर मा शामिल बि च ?

 क्या भाषिक विमर्श का मूल से उपजीं हमरि ई संस्था भाषा अर साहित्य तैं एक मानिक महज साहित्यिक आयोजनों जन्न कि कवितापाठ, क्वी संजैत संग्रै पोथि आदि छपेकि या पुस्तक विमोचन या सम्मान समारोह उर्याकि अपडा भाषिक कार्यों कि इतिश्री त नि मान लिणी छन ? 

क्या हमरि यों संस्थाओं तैं भाषा कार्ययोजना अर साहित्यिक कारिजों मा फर्क मालूम च ? 

मितैं इन्न लगद कि हमरि अधिसंख्य संस्था भाषिक अर साहित्यिक गतिविधियों मा फर्क नि समझणि,वो विशुद्ध साहित्यिक आयोजनों तैं भाषा आंदोलन एजेंडा से सीधा जोडिक ही ना बल्कि एक ही मानिक हिटणा। साहित्यकार अर कवि अगर ये भ्रम मा छन कि केवल कवितापाठ से या पोथि छपाण से हमरि संकटग्रस्त भाषा बची सक्दिन त ये से बडो भ्रम कुछ नि ह्वे सक्दो।

यदि भाषिक विमर्श का मूल से उपजीं संस्था बिना कै सुनियोजित एजेंडा का दगड़ि कवितापाठ,पुस्तक प्रकाशन,लोकार्पण आदि जन्न साहित्यिक गतिविधियों तैं भाषाई विकास अर भाषा बचाओ आंदोलन का एजेन्डा कि इतिश्री करदन त निश्चित रूप  से हमरि भाषा भयंकर  रूप से खतरा मा छन। 

विद्ववतजनों जब भाषा तैं बोलण वळा ही नि राला त कैल पढ़णै यो साहित्य ? तब यो सृजित साहित्य खाली शोध को विषय  व्होलु । क्या हम अपड़ि भाषा का  इन्ना दिन देखणै गाणि स्याणी कन्ना छौ?  क्या येका  बान ही हुईं इथगा फिरडा फिरड ? 

यदि साहित्यकार आज लिखणो छोड़ी बि देला त बि इथगा काम त व्हेय ही जालो कि ना ?  फिर भै जब भाषा अर पहाड़ ही नि बचलो त कैन पढ़णी यी पोथि ? कुछ लोग 8 वी अनुसूची को नौ अक्सर लीणा रैन्दी ,कि जी 8वी अनुसूची मा शामिल करा अर भै जब भाषा बचलि त लिखै बि जालु अर 8 वी अनुसूची मा शामिल बि ह्वे ही जैली पर इन्नी 8वी अनुसूची या किताबों को बि क्या काम कि केवल शोध को विषय बणिक रैं जैं भाषा।

आज ये दौर मा भाषा जनचेतना तैं राष्ट्रीय स्तर पर समाज का हर घार अर हर मनखि बीच लेकि जाणै जरूरत च। भाषा तैं हीनता छोड़िक अस्मिता अर गौरव को विषय बणाणै जरूरत च। समाज तैं अलमारियों मा बंद साहित्यै जरूरत नि बल्कि इन्ना साहित्य सृजन की जरूरत च जैकि घर घर मा सुलभ उपलब्धता बि हो। मितैं लगद  सब्बि साहित्यकारों तैं,भाषा साहित्य संस्थाओं तैं सृजित साहित्य कि सामूहिक या सहकारिता आधारित सुलभ वितरण व्यवस्था परैं बि  विचार विमर्श कन्नै सख्त जरूरत च। जब हम आफ्फि नि पढणा त हौरि लोगोंन किलै पढ़ण। 

आज भाषै कुटरि/ फंचि/खुचकंडी त्यार कैरिक मातृभाषा पुस्तकालय बणाणै जरूरत बि च त अपड़ि विशुद्ध साहित्यिक जिकुड़ी मा एक कुणा मातृभाषा को त्यार कन्नौ, मेरि मातृभाषा मेरि पछ्याण ,आखिर कन्नुक्वे बचलि मातृभाषा अभियान आदि शुरु कन्नै जरूरत बि च ।

म्यार विचार त यो च कि हमरि भाषाओं तैं जतगा जरूरत नै कवियों,साहित्यकारों कि च वे से जादा जरूरत भाषा बोलण, पढ़ण ,सुणण समझण वलों कि बि च।  त येका वास्ता इन्नी संस्थाओं तैं मातृभाषा साहित्य को पुस्तकालय स्थापित कन्नु, मातृभाषा अर संस्कृति का रस मा रच्यां भाषिक एजेन्डा तैं हर संस्था तक लिजाणु वूंंकी भागीदारी सुनिश्चित कन्नु या एक इन्न भाषिक माहौल तैयार कन्नु बि हुण चैन्द जैमा ना केवल पहाड़  का गौं बाजार मा बल्कि सुदूर प्रवास मा बि लोग अपड़ि भाषा से सगर्व जुड़ीं सकीं।

मातृभाषा जनजागरूकता अभियान स्कोल कालेजों से लेकि स्थानीय बाजार / व्यापार मण्डलों ,सब्बि रैवासी अर प्रवासी सामाजिक संगठनों कि भागीदारी जरूरी हुण चैन्द। हमरि मातृभाषा हमरि पछ्याण जन्न अभियान बरोबर चलण चैन्दि । स्कोल कॉलेजों मा मातृभाषा सुलेख/निबन्ध लेखन प्रतियोगिता, भाषण प्रतियोगिता, अंताक्षरी प्रतियोगिता ,काव्यपाठ प्रतियोगिता आदि को आयोजन कैरिक नै पीढ़ी तैं प्रोत्साहित कन्नै जरूरत च। सांस्कृतिक आयोजन वळी संस्था लोकगीत या लोकनृत्य प्रतियोगिता कैरिक या इन्नी क्वी कार्यशाला उर्यैकि अपड़ि भागीदारी सुनिश्चित करि सक्दिन। पर सब चुलै पैली जरूरत च अपडा घार मा अपड़ि मातृभाषा  तैं बचाणै। 

भाषा का एजेंडा तैं समाज का बीच लिजैकि ही समाज मा भाषा का प्रति जागरूकता आ सकद,केवल ऑनलाईन/ऑफलाईन कवि सम्मेलन या पुस्तक विमोचन से भाषै भल्यार नि ह्वे सक्दि। नै पुराणा लिख्वारों बीच बि भाषिक साहित्यिक संचेतना वास्ता गंभीर विमर्श जरूरी च याँ से नै छवाळि तैं वरिष्ठ साहित्यकारों का तजुर्बा से काफी कुछ सिखणो मिली सकद।

आज हमरि भाषाओं का संरक्षण,संवर्धन अर प्रोत्साहन वास्ता हम सब्यूँ तैं एकजुट व्हेकि एक राष्ट्रीय जनजागरूकता अभियान चलाणै जरूरत च जैका वास्ता मंच,माला अर माया को मोह छोड़िक निस्वार्थ भाव से मातृभाषा प्रचारक बणि अपडू  योगदान दिणै जरूरत च। अगर भाषिक चेतना नि व्होलि त राज्य मा ईं माटि कि मातृभाषाओं तैं तिरैकी हौरि भाषाओं तैं राजभाषा रूप मा थर्पणै प्रपंच चलणा राला अर  एक दिन अपड़ि ही धर्ती मा हमरि मातृभाषा दम तोडी देली। 

भाषा तैं केवल भाषा प्रेमी ही बचा सक्दिन क्वी कवि , लेखक या साहित्यकार ना। आज एक विशुद्ध मातृभाषा एजेन्डा परैं मिलजुलिक काम कन्नै सख्त जरूरत च। इलै भाषिक अर साहित्यिक संस्थाओं तैं भाषा प्रचारक पैदा कन्नै जरूरत च बजाय आत्ममुग्ध कवियों तैं पैदा कन्नै । दुःखद बात या च कि फिलहाल अति आत्ममुग्ध कवियूँ अर साहित्यकारों फौज जादा त्यार हुणी। 

किलैकि भाषा एक सामाजिक अर परंपरागत रूप से कमैई संपत्ति होंद इलै ईं धरोहर तैं नै छवाळि तक विरासत रूप मा सौंपणै भारी जरूरत च। यो एक सामूहिक कार्य च जैमा समाज कि हर संस्था हर व्यक्ति कि भागीदारी जरूरी च।भाषा तैं बचाणु सिर्फ साहित्यकारों को काम नि ,साहित्यकार बचा बि नि सकदा ,यो भ्रम जतगा जल्दी खत्म व्होलु अर जतगा जल्दी येमा समाजिक भागीदारी सुनिश्चित करे जाली भाषा वास्ता उतगा उत्तम व्होलु नथिर 'ग्रेट अंडमानी भाषा' सी हालात हुणा मा जादा देर नि लगणि। 

सरकार द्वारा प्राथमिक अर जूनियर स्तर पर गढ़वाळि,कुमौनी,जौनसारी अर रंग भाषा तैं शामिल कन्नै घोषणा, पुस्तक प्रकाशन आदि कुछ सराहनीय कदम जरूर उठाये ग्यीं पर यी नाकाफी छन। ईं दिशा मा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल कि पहल बि सराहनीय छन। मातृभाााषाओं मा शिक्षा की सरकारी पहल बि स्वागत योग्य कदम च। पर हालात का हिसाबन यो प्रयास नाकाफी छन।मातृभाषाओं का मुद्दों परैं सरकारों अर  नेताओं परै सामाजिक दवाब बणाणै जरूरत बि च । साहित्यकारों को मंच,मैक अर माला मोह छोडयां बिना यो काम थोड़ा मुश्किल जरूर च पर इथगा असंभव बि नि लगदो। 

भारतै तमाम स्थानीय भाषा बोलियों अंग्रेजी को बढ़दा व्यावसायिक दबाब का कारण संकटग्रस्त छन। किलैकि व्यवसायिक, प्रशासनिक,चिकित्सा,तकनीकी सब्बि कि आधिकारिक भाषा अंग्रेजी रोजगार कि भाषा बणि ग्याई इलै मजबूरी मा नै छवाळि को बि अपड़ि मातृभाषा से मोह भंग सी हुँदा जाणु। मातृभाषा का प्रति एक हीन भावना समाज मा पैदा हुँदा जाणि च। सरकार तैं चैन्द कि वो पुस्तक प्रकाशन प्रोत्साहन योजना से उब्बू सोचिक विलुप्त अर संकटग्रस्त भाषाओं तैं बचोणा गंभीर नीति पर कार्ययोजना तैयार कैरिक यों तैं शिक्षा ,रुजगार कि भाषा बणाणै कार्ययोजना तैयार कैरिक हमरि मातृभाषाओं का जानकारों तैं  निगमों, निकायों, पंचायतों, बैंकों अर हौरि सरकारी विभागों मा रोजगार द्याव। याँ से ना केवल अंग्रेजी को दवाब कम व्होलु बल्कि इन्नी सकारात्मक नीतियों से नै पीढ़ी मातृभाषा का प्रति हीन भावना से बि मुक्त  व्होलि,भाषा संरक्षण अर जागरूकता बि पैदा व्होलि अर हम यूँ भाषाओं तैं वो सम्मान बि दे सकला जैकि वो हकदार  छन।

हमरि मातृभाषाओं का संरक्षण अर संवर्धन वास्ता भाषा साहित्यिक दस्तावेजो को डिजिटलिकरण कन्नै पहल बि जरूरी च। लोकसाहित्य, लोकगीतों अर मातृभाषा साहित्य आदि का श्रव्य दृश्य/ऑडियो विज़ुअल डाक्यूमेंटेशन/दस्तावेजीकरण बि जरूरी च। सरकार अर सम्बंधित विभाग ईं दिशा मा कुछ सक्रिय त दिखेणा छन पर अब्बि यो कार्यों मा स्पष्टता अर व्यापकता को अभाव च। अब्बि यो काम शुरवाती चरण मा च।

साल न्याल बात या च कि उत्तराखण्डै मातृभाषाओं तैं बचाणै मातृभाषा अभियानै शुरवात अपडा घार बटि उत्तराखण्ड समाज का हर व्यक्ति तैं शुरू कन्नी पोडली । भाषा साहित्य का विद्वानों ,भाषिक अर विशुद्ध साहित्यिक संस्थाओं तैं मातृभाषा अभियान कि अगल्यार लिण पोडली अर एक सुनियोजित,राष्ट्रव्यापी मातृभाषा संरक्षण को एजेन्डा दगड़ि प्रबुद्ध सामाजिक संस्थाओं अर सर्या समाज तैं शामिल कैरिक काम कन्न पोडलु तब निश्चित रूप से सामाजिक जनभागीदारी से यो अभियान सफल व्होलु अर आण वळा बगत मा हमरि मातृभाषा, हमरि पछ्याण अर हमरू साहित्य सब्बि बच्यां राला। एक फलदा-फुलदा हैसदा- खेलदा लोक समाजे हमर स्वीणा हमरि गाणि बि तब्बी सै अर्थों मा साकार व्हेली अर सार्थक व्होलु हमरू 'अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस'।


Tuesday, January 5, 2021

 हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका 'युगवाणी' के इस अंक  में प्रकाशित ,प्रख्यात साहित्यकार समालोचक आदरणीय भैजी श्री वीरेंद्र पंवार जी द्वारा लिखित "आखर" संग्रह की पुस्तक समीक्षा।


आदरणीय श्री वीरेंद्र पंवार जी व श्री संजय कोठियाल जी, संपादक युगवाणी पत्रिका का इस स्नेह हेतु बहुत बहुत हार्दिक आभार।

हे परमेश्वरा !

 हे परमेश्वरा ! 


मि देखणु छौं

सम्सूत घनघोर सर्द रातियूं मा

सडकै तीर जड्डल थथरौंद मनखि तैं

भूखल बिबलौंद एक मोरण्या शरील तैं 

जु कुछ नि चांदू 

हे परमेश्वरा ! 

त्वे से

सिवा एक गफ्फा का 


मि देखणु छौं 

घुण्डों सार

जिंदगी हिसोरद

वे नौना तैं 

जैकी मुखडी परैं

बगतै खोट निशान

हे परमेश्वरा ! 

अब भारी पोड़ण बैठी ग्यीं 

वेकि बालापन्नै हैंसी पर 


मि देखणु छौं

वीं निर्भगी ज्वान छोरी तैं

ज्वा साखियूँ बटि दिणी 

अग्निपरीक्षा दुन्या सामणि

दौ पर दौ खेले जाणा छन

जैंकि लाज परैं

अर बाच जैंकि

दबै जाणि 

पौरुष अहम से

हे परमेश्वरा ! 

ये समाज का 


मि देखणु छौं 

वा आग 

ज्वा भभरौणी

जिकुड़ा मा वेकि

जैतैं डमाणा रैं लोग

हे परमेश्वरा ! 

सदानि कमजोर समझिक

मुछ्यालोंन 


मि देखणु छौं 

फूल माला पैरद-पैरान्द

सम्मानित हूंद-करद

मनै वो चोर तैं

ज्यू अलझयूँ च 

अज्यूँ तलक बि

मिथ्या फेर मा 

हे परमेश्वरा ! 

मुण नक्क नकन्यैकि


मि देखणु छौं

आखिर साँस लेकि

छट्ट प्राण छोड़द 

वे शाश्वत सच तैं

जैकी गौळी मिलजुलिक

दबै सदानि दुन्यै झूठन 

हे परमेश्वरा ! 

तेरि सौं खै खैकि


मि देखणु छौं

आदिमैं साखियूँ खैरि

दुख अर पीडै पाड

अस्धरियूँ समोदर

हे परमेश्वरा ! 

चौतर्फ पसरयाँ

आसै रूखा रेगिस्तान मा  


मि देखणु छौं

आँखि बुजिक 

शान्तचित्त व्हेकि

अब अफ़्फ़ु तैं 

हे परमेश्वरा ! 

चौतर्फ घनघोर

अन्ध्यरु व्हेगी

अब मैं कुछ नि दिखेंणु

मैं बि ना 

सिर्फ दिखेंणु छै

चौछवडि अब

तू ही तू 

हे परमेश्वरा ! 


- गीतेश सिंह नेगी

Sunday, January 3, 2021

प्रीतम सतसई

 गढ़वाळि लोकसाहित्य मर्मज्ञ अर भाषा साहित्यै पछ्याण आदरणीय भैजी डा0 प्रीतम अपछ्याण जीक सद्य प्रकाशित पोथि  'प्रीतम सतसई'  (गढ़वाळि दोहा संग्रै) मिली।  डा0 प्रीतम अपछ्याण जी गढ़वाळि का जण्या मण्या साहित्य सेवक,साधक छन। चकोर ,उमर बुण्दि जा ,ध्वनियों के शिखर,मेरी रचना,गाँव के बयान अर प्रीतम सतसई भाषा साहित्य अर संस्कृति प्रेमियूं खुण आपै साहित्यिक साधनौ प्रसाद छन  ।

 

आपै गढ़वाळि कथा संग्रै, गढ़वाळि उपन्यास,गढ़वाळि गीत संग्रै, शोध प्रबंध जन्न कतगे हौरि ग्रंथ प्रकाशन की जग्वाळ मा छन। 


दोहा छंद भारतीय साहित्य परम्परा मा भौत खास, गागर मा सागर भोरणै सक्या रखण वळा अर तंत मनै जांदिन। सूर, कबीर,तुलसी आदि अर गढ़वाळि मा भजन सिंह 'सिंह' (सिंह सतसई) ,अबोधबन्धु बहुगुणा(तिड़का),कन्हैयालाल डंडरियाल (नागरजा भाग1,2,3,4 ),भगवती प्रसाद जोशी 'हिमवन्तवासी' जी (सीता बणवास) जन्न जण्या मण्या कवियों दगड़ि हौरि बि कवियोंन दोहा छंद मा लोकप्रिय रचना रंचीं।


उन्नीस विषयों परैं सुमरीं ,हिंदी भावानुवाद दगड़ि सात सौ तिरानब्बे दोहों से सजीं , हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट बटि प्रकाशित 180 पेज की  'प्रीतम सतसई' गढ़वाळि साहित्य प्रेमियूं वास्ता इलै बि खास च कि सतसई परम्परा मा या भग्यान भजन सिंह 'सिंह ' जीक ' सिंह सतसई' बाद दूसरी ऐतिहासिक सतसई च।  


उन्न त दोहा पढ़ण समझण मा सरल होन्दन  पर असल मा यो द्वी लैना चार चरणों मा कवि का जीवन दर्शन अर तजुर्बै पूँजी को सार होन्दन। 


कविता,गीत, गजल अर गद्य मा प्रीतम जीक सल्ल -सगोर अर लेख्वारि मिजाज से हम सब्बि भल्लि कै परिचित छौ । 

दोहा छंद मा बि प्रीतम जीक साधना गैरे को अन्ताज ,प्रत्यक्षम किम् प्रमाणम् ढंग से एक दोहा तैं देखिक ही उजागर व्हेय जांद :  


जीवन की ईं चक्कि मा, मिन पीसे दिन रात

ल्वे छौंकी की दाळ अर,आँसु उमाळी भात।


ईं  ऐतिहासिक सतसई मा प्रीतम जीक इन्ना इन्ना सात सौ तिरानब्बे दोहा रच्याँ छन । गढ़वाळि भाषा साहित्य प्रेमियूं वास्ता 'प्रीतम सतसई ' एक खास साहित्यिक धरोहर जन्न च। हिंदी भावानुवाद से पोथि हौरि बि असरदार बणि ग्याई।


  ईं पोथि तैं ग्वालदम कि हिवांली काँठीयूँ कि वीं पवेतर धर्ती बटि अरब सागर का ये छोर तापी का पावन छाल तक इतगा दूर मि तलक सप्रेम पहुंचाणा वास्ता मि आदरणीय प्रीतम अपछ्याण भैजी को  ह्रदय से आभार व्यक्त करदु अर माँ सरसुती अर माँ नंदा जीक इन्नी कृपा आप परैं सदानि बणि रौ ईं मंगलकामना प्रार्थना करदु। 


बाकी जल्द फैलास कैकि 

गीतेश सिंह नेगी

Friday, May 25, 2018

श्री भीष्म कुकरेती व श्री गीतेश नेगी के बीच सृजन संवाद



श्री भीष्म कुकरेती गढ़वाली साहित्य  में एक जाना पहचाना नाम है । वे गढ़वाली साहित्य के ख्यात व्यंग्यकार ,समीक्षक  और आलोचक हैं तथा गढ़वाली भाषा साहित्य के प्रचार प्रसार में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है । समय समय पर वे विभिन्न माध्यमो से गढ़वाली भाषा -साहित्य से जुड़े मूल मसलौं पर भी बेबाकी से अपनी राय रखते रहे हैं । इस दौर में जहाँ एक ओर यूनेस्को जैसी अन्तराष्ट्रीय संस्थाएं गढ़वाली -कुमाउनी आदि  भाषाओं के प्रति संवेदनशील  नज़र आती हैं तथा उनको संकटग्रस्त भाषाओं की श्रेणी  में सूचीबद्ध करती हैं तो  दूसरी ओर गढ़वाली -कुमाउनी भाषा साहित्य  से जुड़े लेखक ,कवि ,साहित्यकार और भाषा -संस्कृतिकर्मी भी अनवरत साहित्य सृजन द्धारा गढ़वाली -कुमाउनी  को संविधान की आठवी अनुसूची मे शामिल करने हेतु प्रयासरत हैं ,ऐसे समय में गढ़वाली साहित्य से जुडे विभिन्न पहलुओं और विभिन्न विधाओं में इसकी वर्तमान  सृजन स्थिति पर श्री गीतेश नेगी ने भीष्म कुकरेती जी से एक लम्बी बातचीत और बेबाक चर्चा की ।

पाठकों  हेतु पेश हैं इस लम्बी बातचीत और चर्चा के कुछ अंश :

गीतेश नेगी - गढ़वाली साहित्य सृजन की आपकी यात्रा कब और कहाँ से शुरू हुई ?
भीष्म कुकरेती -  यद्यपि  मैं विज्ञान का विद्यार्थी था किन्तु कथा साहित्य से रुझान शायद जन्मजात था। कविता बांचने  से मैं  आज भी डरता हूँ।  हाँ हास्य कवितायें मुझे पसन्द है।  साहित्यिक उपन्यास व जासूसी साहित्य दोनों को मैंने विद्यार्थी काल  में बहुत बांचा।  MSC में अंग्रेजी में सिद्धस्त होने के लिए अंग्रेजी उपन्यास  लिया।  सर्वप्रथम God Father बांचा  और फिर James Hadley Chase के व अन्य इतर POP लिटरेचर खूब पढा।
मुम्बई आने पर सेल्स लाइन में आने से मैनेजमेंट की पुस्तकें खूब पढ़ी।  किन्तु साहित्य से जुड़ा ही रहा। यहीं   विद्यार्थी काल के मित्र श्री गिरीश ढौण्डियाल भी साहित्य में रूचि  साहित्यिक चर्चा होती रहती थी।  मई एक संस्था  शैलसुमन  से जुड़ा वहां स्व प्रोफ शशि शेखर नैथानी , स्व अर्जुन सिंह गुसाईं जैसे साहित्यिक वृति के लोग मिले.  श्री देवेश ठाकुर से भी मिला।  बाद में सारिका के उप सम्पादक श्री सुरेश उनियाल भी मिल गए और साहित्यिक गोष्ठियों में  भाग लेने का मौका मिला, कला नाटकों को देखने का मूक मिला।  स्व कमलेश्वर , स्व मुद्गल व उनकी पत्नी से भी मिला हुआ।  जब सुरेश उनियाल जी दिल्ली आ गए तो कम्पनी काम से दिल्ली जाना होता था तो उनियाल जी के साथ  एक दिन पूरा  बिताता  था।  रमेश बत्रा जी, अवश्थी जी , रमेश  बिष्ट जी , बल्लभ डोभाल जी , गंगा प्रसाद विमल आदि से कॉफी हाउस में गोष्ठी सुनता था। 

गीतेश नेगी - तो आपने तब तक लेखन शुरू नही किया था ?
भीष्म कुकरेती -नही।  सुनने में आनन्द आता था।  सेल्स लाइन में टुरिंग  जॉब था तो नए नए लोग , नई नई संस्कृति के दर्शन होते थे। आज भी।  श्री अर्जुन सिंह से तकरीबन हर महीने मिलता ही था।  गुसाईं जी ने  हिलाँश प्रकाशन  शुर कर दिया था।  व मेरी बिल्डिंग में ही प्रोफेसर डोभाल के यहां साहित्यिक कछेड़ी  जमती थी।  मेरी शादी 11 मार्च 78 को कोटद्वार में हुयी और भोज देने गाँव भी गया था।शादी होने के बाद  मुम्बई आने के दो दिन बाद मैं कार्यालय जा रहा था कि अर्जुन सिंह जी मिल गए।  कहने लगे '" भीषम बाबू ! यार उत्तराखण्डी बड़े असंवेदनशील जैसे हो गए हैं। एक कहानी नही मिल रही है किसी से।  अगर आप लिख दें तो मार्च अंक के लिए कथा.. "
मैं तरोताजा गाँव से आया था और पलायन से उपजे नए सामाजिक समीकरण से आमना सामना हुआ था।  मैंने रात में ही अपनी शादी के अनुभव में कल्पना जोड़कर हिंदी में  'काली चाय ' कथा लिख डाली (काली चाय नाम गुसाईं जी ने दिया ) पलायन बिभीषिका  दर्शन था इस कथा में।  जब पाठकों ने कथा पढ़ी तो उन्हें लगा मैंने उनकी कथा लिख दी।  पिता जी के ड्राइवर थे स्व लाल सिंग जी।  वे कुमाऊं के थे और उन्होंने कथा पढ़कर कहा था ," पण्डि जी मेरे गांव कब गए थे।  म्यार गाँव की कथा च ... " . इसी तरह मुम्बई के कई पाठकों ने कथा पढ़ी और कथा नही असलियत कह कर प्रशसा  की।

गीतेश नेगी-  तो आपकी प्रथम कथा हिंदी में थी ?
भीष्म कुकरेती - जी हाँ और फिर दूसरी कथा तो मैंने स्व प्रेमलाल बड़थ्वाल जो बिल्डिंग में चौकीदारी करते थे व दिन में इनकम टैक्स ऑफिस की कैंटीन में काम करते थे की असल जिंदगी पर कथा लिख डाली।  इसमें नायक यहां कसकर मेहनत करता है, रहने को घर नही  और घर से उसके पिताजी नए मकान बनवाने के पत्र लिखा करते थे क्योंकि घर में दिखाना है कि मेरा बेटा कमाता है।  करुणामय कथा थी। इस पर बहुत ही अच्छे प्रतिक्रियाएं मिली कि यह भी रियल स्टोरी है।  हिलांस में सत्य घटनाओं या सच्ची नायिकाओं संबंधित कथाएं हिलांस में प्रकाशित हुईं।  अलकनन्दा के सम्पादक से गढ़वाली गद्य 'गाड म्यटेकी गंगा ' व शैलवाणी मिलीं। 

गीतेश नेगी- यहां से गढ़वाली साहित्य में प्रवेश ?
भीष्म कुकरेती - नही जी।  मेरी एक एक व्यंग्य कथा 'वेस्टर्न हल ' कथा हिलांस में छपी थी।  उसमे मैंने वजनदार वेस्टर्न हल उठाकर अपने गाँव से लयड़  पहाड़ी  चढ़ने  का जीवन्त वर्णन  किया था।  स्व रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी ' जी के पत्र आया कि यह पहाड़ी  जसपुर की  है कि बड़ेथ की ।  पहाड़ी जी प्रथम गढ़वाली डीएम स्व गोविंद प्रसाद  घिल्डियाल (जिन्होंने हितोपदेश कथाओं का गढ़वाली अनुवाद प्रकाशित किया था ) के पुत्र थे व उनका मामाकोट मेरे गांव से एक मील दूर बड़ेथ। था  पहाड़ी जी का बचपन बड़ेथ में ही बीता था।  उन्होंने मुझे गढ़वाली में लिखने को उकसाया और एक पत्र आने के बाद मैंने 'कैरा को कतल ' कथा लिख डाली।  इसमें हर वाक्य में 'के ' अक्षर से शुर होने वाले शब्द थे  प्रयोग हुए हैं।  यह कथा अलकनन्दा में छपी किन्तु मेरा पास उपलब्ध नही है।  मैंने अपनी  सभी हिंदी व गढ़वाली कथाओं के संग्रह निकलने हेतु अलकनन्दा के श्री स्वरूप ढौण्डियाल को सौंप दी थी किन्तु वे छाप नही सके और उनके देहावसान के बाद कुछ पता नही चला।  इससे पहले स्वरूप जी ने मेरी पुस्तक 'गढ़वाल की लोककथाएं ' भी प्रकाशित की।
गीतेश नेगी- तो ऐसा शुरू हुआ आपका गढ़वाली भाषा साहित्य में प्रवेश ?
भीष्म कुकरेती - जी हाँ गढ़वाली कथाएं व व्यंग्य हिलांस , अलकनन्दा , अंजवाळ में प्रकाशित होता गया।

गीतेश नेगी - धाद पत्रिका में तो आपके धारदार घपरोळी लेखों की बड़ी चर्चा हुयी थी।
भीष्म कुकरेती - हाँ ! लोकेश भाई से प्रगाड़  मित्रता थी व है। धाद में मैंने मानकीकरण विरुद्ध लेख -बीं बरोबर गढ़वाली, ह्वे त गे मानकीकरण , , , थौ व असली नकली गढ़वाली लेख लिखे जो चर्चा में आ गए।  श्री अबोध जी व बाबुलकर जी ने कठोर भर्त्सना की , श्री भगवती प्रसाद नौटियाल जी ने मेरे विरुद्ध में व्यंग्य लिखा। 

गीतेश नेगी - आप स्वभाव से कंट्रोवर्सियल नही हैं किन्तु गढ़वाली में घपरोळ करवाते हैं।  श्री नौटियाल जी के विरुद्ध अशिष्ट भाषा में लेख, श्री नरेंद्र कठैत के विरुद्ध इंटरनेट में लेख, चिठ्ठी पत्री  में 'अलग गढ़वाली राज्य की आवश्यकता ' जैसे लेख  आदि  आपके स्वभाव के विरुद्ध हैं।  फिर भी ?
भीष्म कुकरेती - यह ठीक है मैं कंट्रोवर्सी से बचता  हूँ।  किन्तु जब मैं गढ़वाली साहित्य में उतरा तो पाया कि बड़ा ही स्टीरियो टाइप माहौल है व चर्चा होती नही है तो मैंने इस तरह से लिखना शुरू किया कि जो भी गढ़वाली में लिखा जाय उस पर चर्चा हो साहित्यकार चर्चा करें व पाठक इन्वोल्व हो जायँ।  गढ़वाली साहित्य में मेरे लेखों ने स्टीरियो टाइप स्थिति तोड़ी थी।

गीतेश नेगी - इंटरनेट में भी आपने कामसूत्र का अनुवाद पोस्ट कर दिए थे ? रामी बौराणी को बैन करने की पोस्ट आदि
भीष्म कुकरेती -जी यह भी सोची समझी रणनीति के तहत ही किया।
गीतेश नेगी -रणनीति ?
भीष्म कुकरेती - मै शुरू से ही मानता रहा हूँ कि जब तक गढ़वाली के बारे में चर्चा , बहस , घपरोळ न हो आम पाठक गढ़वाली में रूचि नही लेगा।  तो मैंने सबसे पहले इंटरनेट सर्कल ( उस समय इंटरनेट ग्रुप होते थे ) में मैंने पहले रामी बौराणी गीत पर बैन का लेख पोस्ट किया , ' Brahimin Vad of Madan Duklan लेख लिखा जिसमे मदन डुकलान पर ब्राह्मण वाद का अभियोग लगाया। दोनों पोस्ट पर काफी चर्चा हुयी।  इंटरनेट धारकों को पता चला कि गढ़वाली में भी साहित्य होता है। इस बहस से ' दर्जन से अधिक लोगों ने 'चिट्ठी पत्री ' पत्रिका मंगाई
गीतेश नेगी - और कामसूत्र का गढ़वाली अनुवाद ?
भीष्म कुकरेती  - कामसूत्र  अनुवाद ने भूचाल ला दिया था।  400 से अधिक प्रतिक्रियाएं आयीं।  गाली भी खाई।  कईयों ने गढ़वाली में पुस्तक छापने की गुजारिश भी की।  अधिसंख्य लोगों ने प्रथम बार  गढ़वाली पढ़ी। 
गीतेश नेगी -आप 'गढ़ ऐना ' दैनिक से भी जुड़े रहे तो   ...
भीष्म कुकरेती - जी दैनिक गढ़ -ऐना 88  -91  तक तीन साढ़े तीन सालों  तक छपा। मैं गढ़ ऐना के लिए रोज एक व्यंग्य या अन्य लेख भेजता था बाद में मैंने एक व्यंग्य चित्र रोजाना भेजना शुरू किया। 
गीतेश नेगी -अच्छा ?
भीष्म कुकरेती - हाँ और इसके अलावा गढ़वाली  क्रॉस वर्ड भी छपवाए , बच्चों के लिए चित्रों के द्वारा कुछ पज्जल्स भी प्रकाशित किये।  गढ़वाली में समालोचना की शुरुवात भी मैंने ही की। गढ़वाली में इंटरव्यू  विधा की शुरवात की।

गीतेश नेगी -गढ़वाली साहित्य में आपने किन किन विधाओं पर कार्य किया हैं
भीष्म कुकरेती  - परम्परागत और इंटरनेट माध्यम में कुल मिलाकर 25 से अधिक कथाएं , 2000 से   अधिक व्यंग्य , 700 के व्यंग्य चित्र , क्रॉस वर्ड्स , पज्जल्स , एक नाटक, समालोचनाएँ , अन्य  लम्बे लेख  आदि जैसे   संसार प्रसिद्ध 2000 से अधिक कथाकारों का संक्षिप्त वर्णन , गढ़वाली कविता इतिहास , गढ़वाली कथा इतिहास , गढ़वाली नाटक इतिहास आदि आदि। 
गीतेश नेगी - अनुवाद ?
भीष्म कुकरेती  - हाँ तकरीबन 20 विदेशी भाषाओं व संस्कृत कथाओं का अनुवाद , 25 से अधिक विदेशी नाटकों अनुवाद किया है।  ये नाटक गढ़वाल सभा देहरादून में उपलब्ध हैं।  अपने नाटक 'बखरों ग्वेर स्याळ ' व ललित मोहन थपलियाल जी के  दो नाटक 'खाडू लापता ' व एकीकरण का गढ़वाली अनुवाद ' भी किया। 
गीतेश नेगी - आपने शब्दकोश पर भी काम किया है ?
भीष्म कुकरेती  -जी अंग्रेजी -गढ़वाली शब्दकोश का  फोटोस्टेट संस्करण
गीतेश नेगी -आपने अंग्रेजी में गढ़वाली साहित्य पर लेख भी लिखे हैं।   क्या क्या लिखा ?
भीष्म कुकरेती - गढ़वाली लोक गीतों की समीक्षा , गढ़वाल के तन्त्र और मन्त्रों की समीक्षा , लोक नाटकों पर भरत नाट्य शास्त्र अनुसार टीका , गढ़वाली कविता व कवियों की समीक्षा, नाटकों की समीक्षा , गढ़वाली कथाओं की समीक्सा , १२० लोक कथाययें  अंग्रेजी  लिखीं।  तकरीबन 3000 लेख तो पोस्ट की ही होंगी।  अंग्रेजी में 100  से अधिक व्यंग्य आदि
गीतेश नेगी -अंग्रेजी में लिखने का कारण ?
भीष्म कुकरेती - सिम्पल।  गढ़वाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाना।
गीतेश नेगी -आपने चिट्ठी पत्री के कई विशेषांको के लिए संयोजन भी किया ?
भीष्म कुकरेती -जी हाँ लोक नाटक , कविता विशेषांक आदि के लेख व अन्य साहित्य जुटाया।  फिर अंग्वाळ व हुंगरा जैसे ऐतिहासिक पुस्तकों के लिए साहित्यकारों से सम्पर्क व साहित्य जुटाया।  किन्तु मदन डुकलाण भाई ने इसका विशेष जिक्र नही किया।   दुःख होता है।
गीतेश नेगी -उत्तराखण्ड का इतिहास भी अंग्रेजी में लिखा है आपने ?
भीष्म कुकरेती - जी अभी ब्रिटिश काल तक पँहुच हूँ

गीतेश नेगी -  क्या आप अपने आजतक के लेखन योगदान से संतुष्ट हैं ?
भीष्म कुकरेती  - जी  अभी काफी कुछ पूरा करना है।  हाँ इंटरनेट में 15 लाख से अधिक बार पढ़े जाने से सन्तुष्टि तो होती ही है।

गीतेश नेगी -गढ़वाली कुमाऊनी भाषा -साहित्य के समक्ष वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती ,सबसे बड़ी समस्या क्या  हैं ?
भीष्म कुकरेती  - कैच द्यम  यंग की समस्या हमेशा से रही है।  यंग रीडर्स न पाना सबसे बड़ी समस्या रही है और उसका मुख्य कारण है लिखित साहित्य की वितरण की समस्या।   ऑडियो -वीडियो व इंटरनेट माध्यम से कुछ हद तक समस्या निपट रही है किन्तु फिर भी यंग रीडर्स एक समस्या आज भी है। 

गीतेश नेगी -गढ़वाली साहित्य की वर्तमान दशा क्या हैं ? इसमे किन किन विधाओं में कार्य हो रहा है ?
भीष्म कुकरेती  - कमपैरिटिवली पहले से अधिक काम हो रहा है , स्टीरियो  टाइप को तोडा जा रहा है , कई लेखक जैसे सुनील थपलियाल घँजीर सरीखे  तीखे -बेबाक वाले साहित्यकार भी आगे आएं हैं जो एक शुभ संकेत है। 
नए विषय जैसे डा सत्येश्वर कालेश्वरी का बुलेटिन जैसी सामयिक समाचार की कविताएं रचना , संदीप रावत , धर्मेंद्र नेगी , पयास पोखड़ा की कविताएं , प्रीतम अपछ्याण व कृष्ण कुमार ममगाईं के दोहे  , महेशा नन्द व वीरेंद्र जुयाल आदि की नव कथाएं , सतीश रावत की तिपत्ति नुमा कविता , रमेश हितैषी की सामाजिक सरोकारी कविताएं , लालचन्द राजपूत के जोक्स शुभ संकेत हैं

गीतेश नेगी -वह कौन सा पहलू  है जो  अभी तक अछूता है या जिसमें अधिक कार्य करने की आवश्यकता है ?
भीष्म कुकरेती - एक तो सड़क छाप साहित्य याने गढ़वाली -कुमाउँनी में पॉपुलर साहित्य की ओर किसी की दृष्टि ना जाना सबसे बड़ी कमजोरी है
गीतेश नेगी - सड़क छाप साहित्य ?
भीष्म कुकरेती  - जी हाँ।  हिंदी  प्रसारण में प्रेमचन्द से अधिक योगदान गुलसन नन्दा , रानू , जासूसी उपन्यासों का हाथ अधिक है।  जब तक सड़क छाप याने पॉपुलर साहित्य पॉपुलर न होगा  भाषा का प्रसारण  नही हो पायेगा । और   ...
गीतेश नेगी - और ?
भीष्म कुकरेती  -और फाणु बाड़ी विषय से ऊपर उठकर कॉन्टिनेंटल डिशेज पर भी सोचना होगा।  आज हमारे पाठक देश और दुनिया में सभी जगहों पर वसे  है तो उनके परिवेश व नए ज्ञान को मद्देनजर रखकर साहित्य रचना आवश्यक है इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय  कविताओं या अन्य साहित्य का अनुवाद आवश्यक है।  इस मामले में नरेंद्र कठैत और गीतेश नेगी के कार्य की प्रशसा की जानी चाहिए।

गीतेश नेगी - गढ़वाली कविता की वर्तमान दशा क्या हैं ? एक समीक्षक के रूप में आप इसका भविष्य किस रूप में देखते हैं ? क्या इस दौर की कवितायें पुरानी  वर्जनाओँ  को तोड़कर नये  प्रतिमान नये  बिम्ब और नये  विषयों पर अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रखने में सक्षम हैं ?
भीष्म कुकरेती  - संख्या दृष्टि से अच्छा काम हो रहा है।  हाँ कुछ कवि क्वांटिटिटी पर अधिक क्वालिटी पर कम ध्यान दे रहे हैं।  कुछ कवि फोटोग्राफिकल नैरेसन  को ही  कविता समझ बैठे हैं।  कुछ तो फालतू की कविताएं दिए जा रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि पॉप साहित्य और फालतू के साहित्य में भी अंतर होता है। एक बात बड़ा  खतरनाक पहलू भी है कि बहुत से पोटेंशियल कवि दुसरी भाषा के  साहित्य से परहेज करते हैं और अपने पास  , शब्दकोश , गढ़वाली व्याकरण की पुस्तक  नही रखते हैं।  वैसे नई वर्जनाएं टूट रही हैं और नए अलंकार भी सामने आ ही रहे हैं।

गीतेश नेगी -आज के  दौर की गढ़वाली कविता के वो  कौन कौन से नाम है जो अच्छी और सशक्त कविता लिख रहे  हैं या जिनसे गढ़वाली कविता को एक नई दिशा एक नया विस्तार , नये बिम्ब  नये विषय और नये कलेवर मिलने  की आश बँधती  है ?
भीष्म कुकरेती - इंटरनेट पर कुछ कवि अछि कविताएं पेश कर रहे हैं।  सबसे बड़ी कमी है  कवित्व के स्टैंडर्ड  को  बरकरार रखना।  दूसरा विषय, शैली  या कवित्व में एक्सपेरिमेंट भी कम हो रहा है। 

गढ़वाली कविता का भविष्य तो उज्जवल दिख रहा है. हाँ कवियों को अपने  कवित्व में स्व विकास आवश्यक है

गीतेश नेगी - गढ़वाली में ग़ज़ल विधा में भी आजकल खूब लिखा जा रहा है ,संभावना की दृष्टि से गढ़वाली ग़ज़ल का  भविष्य आपको  कैसा दिखता  है ? कुछ नाम जो इस  विधा  में  सक्रिय योगदान दे रहे  हैं ?

भीष्म कुकरेती - गजल का अपना चरित्र है कि यह फटाफट आकर्षित करती है।  गजल तो अब गढ़वाली साहित्य में  जमी रहेगी। पुराने गजलकार जैसे नेत्र सिंह असवाल , मदन डुक्लाण , मधुसुधन, उमा भट्ट  आदि तो जमे हैं किन्तु जगमोहन बिष्ट , शशि देवली , अतुल गुसाई , पयास पोखड़ा आदि ने दस्तक दी है कि हम भी कम नही हैं। मदन डुकलाण के आने वाले गजल संग्रह हेतु कई नए गजलकार सामने आएं जो शुभ संकेत है।



गीतेश नेगी -गढ़वाली साहित्य में व्यंग्य विधा में हो रहे साहित्य सर्जन पर आपकी क्या राय है ? आपको नहीं लगता की इस दौर में गढ़वाली व्यंग्य , कविता को बराबर टक्कर दे  रहा है  और खूब पढ़ा और पसन्द किया जा रहा है ? गढ़वाली व्यंग्य साहित्य का  भविष्य आपको  कैसा दिखता  है ? कुछ नयी संभावनायें ,कुछ नये  चेहरे ,कुछ नये  नाम ?
भीष्म कुकरेती - हाँ आजकल कविता के बाद व्यंग्य अधिक लिखा जा रहा है।  वास्तव में राजनैतिक व सामाजिक वातावरण व्यंग्य लिखने के लिए फर्टाइल जमीन सिद्ध हो रही है।  पाठक भी व्यंग्य से जुड़ रहे हैं। व्यंग्य तो हमेशा रहेगा गढ़वाली में।  प्रथम आधुनिक कथा व प्रथम  व्यंग्य ही थे।  भीष्म कुकरेती , नरेंद्र कठैत , पाराशर गौड़, हरीश जुयाल  के बाद गढ़वाली को  सुनील थपलियाल घँजीर एक सशक्त व्यंग्यकार मिला है 

गीतेश नेगी - गढ़वाली गद्य में किन किन विधाओं में सर्जन कार्य हो रहा है ?  क्या गद्य  की अपेक्षा पद्य ही  तरफ ज्यादा जोर नहीं है?
भीष्म कुकरेती - व्यंग्य छोड़ गद्य के अन्य विधाओं में कुछ भी नही हो रहा है।  रन्त रैबार में पत्रकारिता का गद्य छोड़ दें और धाद के विशेषांकों के निबन्धों को छोड़ दे तो सूखा ही है। पद्य का जोर अधिक है। दुःख इस बात का है कि गढ़वाली नाटकों  में  सुन्नपट्ट आया है।  बल साहित्य तो अपेक्षित ही है जमानों से।

गीतेश नेगी -गढ़वाली साहित्य सम्मेलनों/ मंचों और साहित्यिक संस्थाओँ द्वारा केवल कविता को जायदा महत्व दिया जा रहा है ?  आपको नहीं लगता की इन स्थानों पर गद्य या साहित्य के अन्य विधाओं ,पहलुओं को  हासिये पर रखा जा रहा है ?
भीष्म कुकरेती - वास्तव में यह सभी भाषाओँ में भी पाया जाता है।  ऑडिएंस को कविया अधिक पसन्द होती है।  शरद जोशी व के पी सक्सेना हों तो गद्य भी सम्मेलनों में पढा जाएगा। 

गीतेश नेगी -गढ़वाली साहित्य में आलोचना-समालोचना के क्षेत्र में कितनी प्रगति हुई हैं ,वर्तमान में हो रहा कार्य क्या संतोषजनक कहा जा सकता है  ? क्या आपको इन विधाओं  में कुछ नयी  संभावनायें कुछ नए सर्जक कहीं दिखाई  पढ़ते  हैं  ?
भीष्म कुकरेती - आलोचना , समीक्षा विधा बची है।  वीरेंद्र पंवार व संदीप रावत की पुस्तकें इसका प्रमाण है।  इंटरनेट पर तारीफ़ वाली टिप्पणियां सही ये टिप्पणियां संभावनाएं की ओर इंगित करती हैं।


गीतेश नेगी -क्या आज भाषाई विरासत के  निब्त एक  और नये सशक्त लोकभाषा आंदोलन की जरूरत आपको महसूश होती है  ?
भीष्म कुकरेती - जी दिल्ली -मुम्बई सरीखे शहरों में कैच द्यम यंग के निबत आंदोलन की आवश्यकता है। 

गीतेश नेगी -लोकभाषा साहित्य के  प्रचार प्रसार और विस्तार में सरकार और सामाजिक  संस्थाओं की क्या भूमिका हो सकती है  ? क्या वे इस दिशा सार्थक और वांछित भूमिका का पूरी सिद्दत के साथ निर्वाहन कर रहे हैं ?
भीष्म कुकरेती - किसी भी भाषा का विकास सरकार नही अपितु समाज करता है।  तो सामाजिक संस्थाओं को लीड लेने की अति आवश्यकता है। सामाजिक संस्थाओं को भी जगाने की आवश्यकता है।

गीतेश नेगी -राज्य की नवगठित  सरकार  से एक समर्पित गढ़वाली साहित्यकार के रूप में आप क्या अपेक्षा रखते हैं ?
भीष्म कुकरेती - अपेक्षाएं तो बहुत थीं किन्तु अब केवल निराशा ही है बस।


गीतेश नेगी  -नयी पीढ़ी के लेखकों और गढ़वाली कुमाउनी भाषा -साहित्य प्रेमियों -पाठकों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे ?
भीष्म कुकरेती - साहित्यकार लिखते रहें और पाठक पढ़ते रहें तो अपने आप सब सुधर जाएगा


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