हिमालय की गोद से

हिमालय  की  गोद  से
बहुत खुबसूरत है आशियाना मेरा ,है यही स्वर्ग मेरा,मेरु मुलुक मेरु देश

Saturday, November 24, 2012

गढ़वाली कविता : " किन्गोड़ाऽ बीज "

" किन्गोड़ाऽ  बीज "

घैल पौडियूँ  बुराँस कक्खी
सुध बुध  मा नि चा फ्योंली भी
बौल्ये ग्यीं  घुघूती भी देखा
फुर्र - फुर्र उडणी इन्हे फुन्हेय
छोड़ अपडा फथ्यला - घोलौं भी  

लटुली फूली ग्यें ग्वीरालऽ
हुयुं लापता कफ्फू  हिलांस
पकणा छीं बेडू भी बस
अब लाचारी मा बारामास 

सूखी ग्यीं अस्धरा  पन्देरौंऽक भी
सरग भी नि गगडाणू चा
लमडणा छीं भ्यालौं - भ्यालौं मा निर्भगी काफल
कुई किल्लेय हम थेय नि सम्लाणु चा

जम्म खम्म पौडयां छीं  छन्छडा
धार हुईँ छीं  लम्मसट
व्हेय  ग्याई निराश कुलैंऽक भी बगतल 
मुख लुकै ग्याई सौंण कुयेडी भी सट्ट 

रूणाट हुयुं डांडीयूँ कांठीयूँ कू
ज्यूडी - दथुड़ी बोटीं अंग्वाल
छात भिटवौली पूछणा स्यारा - पुन्गड़ा
हे हैल -निसूडौं  कन्न लग्ग फिट्गार 

गैल  ग्याई ह्यूं हिमवंतऽक
बस बोग्णी छीं आंखियुं अस्धार
अछलेंद अछलेंद बुथियांन्द  वे थेय
द्याखा  बुढेय  ग्याई देब्ता घाम 

हर्चिं ताल ढ़ोलऽक ,
बिसिग सागर दमौ  महान
बौल मा छीं  गीत माँगल - रासों -तांदी
समझा उन्थेय मोरयां समान 

छोडियाल चखुलीयौंल भी अब बोलुणु
काफल पाको ! काफल पाको !
तब भटेय जब भटेय हे मनखी !
तील सीख द्यीं
अपडा  ही गौं  मा
बीज किन्गोड़ाऽ सोंगा सरपट चुलाणा
बीज किन्गोड़ाऽ सोंगा सरपट चुलाणा  ..........


स्रोत : हिमालय की गोद से , सर्वाधिकार सुरक्षित (गीतेश सिंह नेगी )

Tuesday, June 5, 2012

गढ़वाली कविता : नै रिवाज

 नै  रिवाज 


म्यार मुल्क
एक नै रिवाज
मौ पच्चीस
अर मनखी ४
इन्ह मा कुई
म्वार त म्वार
कन्नू कै म्वार ?

रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार सुरक्षित  

गढ़वाली कविता : योजना


गढ़वाली कविता : योजना 


तुम 
जू बण्या रौ
परवाण 
दिणा रौ बचन 
घैंटणा रौ सौं 
विकासौ  नौ फर 
अर बणाणा रौ 
योजना फर योजना 
साखियुं भटेय 
पर ऐंशु बस्गाल 
बोग ग्यीं सब योजना तुम्हरी 
मेरी खाली कुड़ी 
अर तुम्हरी बांझी पुन्गडी जन्न 
अर तुम ! 
सैद मीस्सै  ग्यै व्हेला चट्ट  फिर 
बणाण फर
एक और योजना 
जू बूढेय जैली 
कटद कटद उक्काल म्यार गौंऽकी 
पर नी पहुँचली सैद कब्बी
विकास 
अर वूं निर्भगी छ्वारौं जन्न 
जू अज्जी तक नी आई बोडिक
म्यार मुल्क 
बरसूँ  भटेय  




रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, May 27, 2012

" गढ़वली फिन्डका "

                        " गढ़वली  फिन्डका  "

(१) कलजुग मा द्याखो  भई ,  मचयूँ  कन्न घपरोल
    मनखी सस्ता व्हेय ग्यीं यक्ख  ,मैहंगू  च  पिट्रोल

(२ ) गरीबी मा जीणु मुश्किल  ,अर आफत  व्हेय ग्याई  मौत
   सरकार व्हेय ग्या सासू जन्न  ,अर मैहंगैई  व्हेय ग्याई सौत

(३ ) खाणा  कु अन्न नी मिलदु ,पीणा कु पाणि
   जैक खुट्टौं बिनाला कांडा   ,पीड़ा वी जाणी

(४)   मैहंगी  व्हेय ग्या सिगरेट बल ,सस्ती च शराब
      पीण वालू जण्या भैई  रे   ,गर  व्हेली मौ  खराब

(५) लोकतंत्र मा हुणा छीं ,किस्म किस्म का खेल
   रोज हुणा छीं परचा उन्का ,रोज हुणा छीं उ फेल

(६) विष खाणा कु पैसा नी मिल्दा , डाली खाणा कु फांस
     बैलू गौडू अर वी भी   डून्डू   ,ब्वाला कन्नू कै करण थवांस

(७ )    ढुंगा व्हेय गईं देबता  ,अर मनखी व्हेय ढुंगा
         पूजद पूजद दुयुं  थेय ,पलटीं कत्गौं का जून्का

(८)     स्याल अटकाणा छीं कुक्कर थेय , गूणी अटकाणा बाघ 
         बिरली कन्नी छीं  रखवली दुधऽकि , कन्न फुट्ट कपाऽल


..........................................................................   क्रम जारी

रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, May 25, 2012

बाँध की विभीषिका पर आधारित गढ़वाली कविता : डाम

A Poem based on dam catastrophe   ;  A Poem based on dam catastrophe by an Asian poet ; A Poem based on dam catastrophe by a south Asian poet ;  A Poem based on dam catastrophe by an SAARC countries poet ; A Poem based on dam catastrophe by an Indian subcontinent  poet ;  A Poem based on dam catastrophe by an Indian  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a North Indian  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a Himalayan  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a Mid-Himalayan poet ; A Poem based on dam catastrophe by an Uttarakhandi  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a Garhwali  poet



 डाम



 

त्वे भी डाम
मी भी डाम
कन्न कपाल लग्गीं यी डाम
सरया पहाड़  जौंल  डाम

कैक मुख आई  पाणि
कैकी लग्ग मवसी  घाम
छोट्ट  छोट्टा व्हेय ग्यीं मन्खी
बड़ा बड़ा व्हेय ग्यीं यी डाम

कक्खी बुगाई सभ्यता युन्ल
कक्खी  बोग्दी गंगा थाम
तोडिऽक करगंड पहाड़
छाती मा खड़ा व्हेय गईं यी  डाम

उज्याला बाटा  दिखैक झूठा
कन्न अन्ध्यरौं पैटीं यी डाम
कुड़ी पुंगडी खैऽकी  हमरी 
कन्न जल्मीं यी जुल्मीं  डाम ?

तैरीक अफ्फ गंगा रुप्यौं की
डूबै  ग्यीं हम थेय यी डाम
बुझे  की भूख तीस अप्डी
सुखै  ग्यीं हम्थेय यी डाम

मन्खी खान्द मंस्वाग द्याख
यक्ख सभ्यता खै ग्यीं यी डाम
साख्युं कु जम्युं  ह्युं संस्कृति
चस्स चुसिऽक गलै ग्यीं  यी डाम

त्वे भी डाम
मी भी डाम
सरया मुल्क डमै ग्यीं यी डाम !
सरया मुल्क डमै ग्यीं यी डाम !



रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार सुरक्षित 


A Poem based on dam catastrophe   ;  A Poem based on dam catastrophe by an Asian poet ; A Poem based on dam catastrophe by a south Asian poet ;  A Poem based on dam catastrophe by an SAARC countries poet ; A Poem based on dam catastrophe by an Indian subcontinent  poet ;  A Poem based on dam catastrophe by an Indian  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a North Indian  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a Himalayan  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a Mid-Himalayan poet ; A Poem based on dam catastrophe by an Uttarakhandi  poet ; A Poem based on dam catastrophe by a Garhwali  poet




Wednesday, May 23, 2012

गढ़वाली कविता : " खैरीऽ का गीत "

गढ़वाली कविता :  " खैरीऽ का गीत "


  मी त गीत खैरीऽ का लगाणु  छौं ! 

  कांडों थेय  बिरैऽकी ,फूल बाटौं सजाणु छौं
  छोडिक अप्डी , दुन्या कि लगाणु छौं
होली दुनिया बिरड़ी कलजुगी चुकापट्ट मा
  सोचिऽक मुछियलौंऽल बाटा दिखाणु छौं 

 मी त गीत खैरीऽ का लगाणु  छौं  !  

तिस्वला  रें प्राण  सदनी जू ,अस्धरियौंऽल उन्थेय  रुझाणु छौं
ज्वा  जिकुड़ी फूंकी रैं अग्गिन   मा ,वा प्रीत पाणिऽल बुझाणु छौं
कु बग्तऽ कि फिरीं मुखडी  सब्या , सुख मा सब सम्लाणु छौं
जौं पिसडौंऽल डमाई सरया जिंदगी मीथै , मलहम उन्ह फर आज लगाणु छौं
                                                 
    मी त गीत खैरीऽ का लगाणु  छौं  !


जौंल बुगाई मिथै  ढंडियूँ मा , उन्थेय  गदना तराणु छौं
 जैल मार गेड खिंचिक सदनी ,वे थेय ही  सुल्झाणु छौं
अटगाई जौंल जेठ दुफरी मा , छैल बांजऽक उन्ह बिठाणु
छौं
जैल  बुत्तीं विष कांडा सदनी , फुल पाती वे खुण सजाणु छौं
  
मी त गीत खैरीऽ का   लगाणु  छौं !
 
 जौं ढुंगौंऽल खैं ठोकर मिल , उन्थेय देबता आज बणाणु छौं
जौंल नि थामू अन्गुलू भी कब्बि  ,कांध उन्थेय लगाणु छौं
  रुसयाँ रैं मि खुण सदनी जू ,   वूं थेय आज मनाणु  छौं
  जौंल रुवाई सदनी मिथै ,भैज्जी वूं थेय  आज  बुथ्याणु छौं
                                                   
मी त गीत खैरीऽ का   लगाणु  छौं  !


रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार  सुरक्षित
स्रोत : म्यार ब्लॉग - हिमालय की गोद से

" ललित केशवान "

गढ़वली अर हिंदी साहित्याऽक   वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय ललित केशवान जी थेय सादर      सप्रेम समर्पित मेरी एक कबिता
          
          " ललित केशवान "

 संवत १८६१ ,.....गते ....
 पौड़ी जिल्ला , पट्टी इद्वाल्स्युं
 छटी ग्या कुयेडी पुरणी  ,चमक चौछ्व्डी घाम
 आ  हा पैदा व्हाई सिरालीऽम   , गढ़  कवि एक महान
  भै  बंधो ,गढ़  कवि एक महान 

 खिल्दा फूल  हंसदा पात ,रुमझुम बरखणी बरखा आज
खित खित हैसणु डांडीयूँ  मा द्याखा , दंतुडी दिखान्द  चौमास
बांजी  पुंगडी  चलदा व्हेंगी , इन्न आई गढ़ स्यारौं मा मौल्यार
भै  बंधो ,इन्न आई गढ़ स्यारौं मा मौल्यार


डालियुं मा चखुली  बसणी छाई , बस्णु  छाई कक्खी कफ्फु हिलांस
 मोरणी छाई मातृ भाषा , करण कैल अब म्यारू  थवांस
कै से करण  आज आश मिल ,छीं दिख्याँ दिन अर  तपयाँ घाम
भै  बंधो ,छीं दिख्याँ दिन अर  तपयाँ घाम

दीबा व्हेय ग्या  दैणी फिर  ,व्हेय ग्या दैणु जय बद्री नरैण
प्रकट व्हेग्या लाल हिमवंत कु , प्रकट व्हेय ग्याई कवि ललित महान
भै  बंधो , प्रकट व्हेय ग्याई कवि ललित महान

कलम प्लायी इन्ह उन्ल तब ,सर सर चलैं  व्यंग बाण
लस्स लुकाई मुखडी अंध्यरऽल , पैटाई जब गढ़ गंगा ज्ञान
प्रकट कै दयाई  भड  गंगू रमोला ,प्रकट कै दयाई हरी हिंदवाण  ,
भै  बंधो , प्रकट कै दयाई हरी हिंदवाण  ,

टूट्ट ग्यीं  मायाऽक जाल पुरणा सब , तिडकीं पुरणा बिम्ब
छौंक लगाई ढौऽल पुरैऽक कविता कु तब  ,  छोलिक  किस्म किस्म
ऽक  रंग
मच  ग्याई जंग असलियात की  तब   ,जब  ध्वलीं   मर्चण्या  व्यंग ,
भै  बंधो ,जब  ध्वलीं मर्चण्या  व्यंग


 भूख  मिटै  बरसूँ की  मेरी ललित ,  तिल्ल  मिटै  साखियुंऽक  तीस
खुश  व्हेयऽक सरस्वती तब्ब  , दिन्द यू  शुभ आशीष
 मातृ भाषा की सेवा मा हे गढ़ गौरव !  अजर अमर  करयाँ   त्वे थेय जगदीश
 मातृ भाषा की सेवा मा हे गढ़ गौरव ! अजर अमर  करयाँ   त्वे थेय जगदीश
 मातृ भाषा की सेवा मा हे गढ़ गौरव ! अजर अमर  करयाँ   त्वे थेय जगदीश |

रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार सुरक्षित