हिमालय की गोद से

हिमालय  की  गोद  से
बहुत खुबसूरत है आशियाना मेरा ,है यही स्वर्ग मेरा,मेरु मुलुक मेरु देश

Saturday, May 21, 2011

गढ़वाली कविता : ठेक्कदार

 
सूबदार,
हौल्दार ,
थाणादार ,
डिप्टी - कलक्टर ,
तहसीलदार ,
डॉ ० और प्रिंसिपल साहब
सबही  प्रवासी व्हेय
ग्यीं
अब रै ग्यीं त  बस
ठेक्कदार,
और उन्का  डूटयाल    
जू लग्याँ छीं  
दिन रात
सबुल लगांण  मा
अफ्फ अफ्फ खुण
पहाड़ मा
म्यारा कुमौं-गढ़वाल मा  !



 
रचनाकार  :गीतेश सिंह नेगी ( सिंगापूर प्रवास से,सर्वाधिकार-सुरक्षित )

गढ़वाली कविता : सम्लौंण



कुछ सुल्झयाँ 
कुछ अल्झयाँ
कुछ उक्करयाँ
कुछ खत्याँ
कुछ हरच्यां
कुछ बिसरयाँ
कुछ बिस्ग्याँ
त कुछ उन्दू बौग्याँ
कुछ हल्याँ
कुछ फुक्याँ
कुछ 
कत्तर - कत्तर हुयाँ
मेरी इन्ह  जिंदगी का पन्ना
बन बनिका  हिवांला रंगों मा रुझयाँ
चौदिश बथौं मा  उड़णा 
हैरी डांडीयूँ - कांठी
यूँ  मा
चिफ्फली रौल्यूं की ढून्ग्युं मा
पुंगडौं-स्यारौं -स
गौडियों मा
फूल -पातियुं मा
भौरां - प्वत्लौं मा
डाली- बोटीयूँ मा
चौक - शतीरौं    मा 
दगड़ ग्वैर-बखरौं मा
हैल - दथडियूँ  मा
भ्याल - घस्यरियौं मा
पाणि -पंदेरौं मा
गुठ्यार- छानियौं  मा
चखुला बणिक
डंडली - डंडली  मा
टिपण लग्याँ
म्यरा द्वी
भुल्याँ - बिसरयाँ खत्याँ 
   बाला दिन 
                                             
   रचनाकार  :गीतेश सिंह नेगी ( सिंगापूर प्रवास से,सर्वाधिकार-सुरक्षित )

गढ़वाली कविता : छिल्लू मुझी ग्या


     
बैइमनौं  का राज मा -ईमनदरी कु
भ्रस्टाचरी गौं - समाज मा -धरमचरी कु
मैंहंगई का दौर मा - गरीबौं कु 
गल्दारौं  का राज मा - वफादरौं कु
ठेकदरौं का राज मा - ध्याड़ी मज्दुरौं कु
प्रधनी की चाह मा - गौं-पंचेतौं कु
अनपढ़ों  का राज मा - शिक्षित बेरोज्गरौं कु
और दरोल्यौं का राज मा - पाणि-पन्देरौं कु
    
छिल्लू  मुझी ग्या 
       
रचनाकार  : ( गीतेश सिंह नेगी ,सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार 
सुरक्षित )      

Tuesday, May 17, 2011

इतिहास के झरोखों से



इतिहास के झरोखों से : उत्तराखंड क़ी बीर गाथाएं (राजा धामदेव क़ी " सागर ताल गढ़ " विजय गाथा )


देवभूमि उत्तराखंड अनादि काल से ही वेदों , पुराणों ,उपनिषदों और समस्त धर्म ग्रंथों में एक प्रमुख अध्यात्मिक केद्र के रूप में जाना जाता रहा है | यक्ष ,गंधर्व ,खस ,नाग ,किरात,किन्नरों की यह  करम स्थली  रही है तो भरत जैसे प्राकर्मी और चक्रवर्ती  राजा की यह जन्म और क्रीडा स्थली रही है | यह प्राचीन  ऋषि मुनियों - सिद्धों की तप  स्थली भूमि रही है | उत्तराखंड एक और जहाँ  अपने अनुपम प्राक्रतिक  सौंदर्य के कारण  प्राचीन काल से ही मानव जाति को को  अपनी  आकर्षित तो करता रहा है तो वहीं दूसरी और केदारखंड और मानस खंड (गढ़वाल  और कुमौं ) इतिहास के झरोखों में  गढ़ों और भड़ों  की ,बलिदानी वीरों की जन्मदात्री भूमि भी कही ज़ाती रही  है | महाभारत युद्ध में इस  क्षेत्र के   वीर राजा सुबाहु (कुलिंद का राजा ) और हिडिम्बा पुत्र घटोत्कच का और अनेकों  ऐसे राजा- महाराजाओं का  वर्णन मिलता है जिन्होने कौरवों और पांडवों की और से युद्ध लड़ा था | नाग वीरों में यहाँ वीरंणक नाग (विनसर के वीर्नैस्वर भगवान ) ,जौनसार के महासू नाग (महासर नाग ) जैसे वीर आज भी पूजे जाते हैं | आज भी इन्हे पौड़ी -गढ़वाल में  डांडा  नागराजा  ,टिहरी में सेम मुखिम,कुमौं शेत्र में बेरी -  नाग ,काली नाग ,पीली नाग ,मूलनाग, फेर्री नाग ,पांडूकेश्वर में  में शेषनाग ,रत्गौं में भेन्कल नाग, तालोर में सांगल नाग ,भर गोवं  में भांपा  नाग तो नीति  घाटी में लोहान देव नाग और दूँन  घाटी में नाग सिद्ध का बामन  नाग अदि नाम से पूजा जाता है |जो प्राचीन काल में नाग बीरो कि वीरता परिभाषित करता है | बाडाहाट (उत्तरकाशी) कि बाड़ागढ़ी   के नाग बीरों कि हुणो पर विजय का प्रतीक   और खैट   पर्वत कि अन्चरियों कि गाथा (७ नाग पुत्रियाँ जो हुणो के साथ अंतिम साँस तक  तक संघर्ष  करते हुए वीरगति  का प्राप्त हो गयी थी ) आज भी " शक्ति  त्रिशूल "के रूप में आज भी नाग वीरों क़ी  वीरता क़ी गवाही देता है तो गुजुडू  गढ़ी का गर्जिया  मंदिर गुर्जर और प्रतिहार वंश के वीरों का शंखनाद करता है | यूँ तो देवभूमि वीर भड़ो और गढ़ों क़ी भूमि होने के कारण अपनी हर चोटी हर घाटी में वीरों क़ी एक गाथा का इतिहास लिये हुए है जिनकी दास्तान आज भी यहाँ के लोकगीतों ,जागर गीतों आदि के रूप में गाई ज़ाती है यहाँ आज भी इन् वीरों को यहाँ आज भी  देवरूप में पूजा जाता है |



उत्तराखंड के इतिहास में नाथ- सिद्ध प्रभाव प्रमुख भूमिका निभाता है क्यूंकि कत्युरी   वंश के राजा  बसंत देव (संस्थापक राजा )  क़ी नाथ गुरु  मत्स्येन्द्र  नाथ (गुरु गोरख नाथ के गुरु ) मे आस्था थी |१० वी शताब्दी में इन् नाथ  सिद्धों ने कत्युर वंश में अपना प्रभाव देखते हुए नाथ  सिद्ध नरसिंह देव (८४ सिद्धों मे से एक )  ने कत्युर वंश के राजा से  जोशीमठ राजगद्दी  को दान स्वरुप प्राप्त कर उस पर गोरखनाथ क़ी पादुका रखकर ५२ गढ़ूं के भवन नारसिंघों क़ी नियुक्ति क़ी जिनका उल्लेख नरसिंह वार्ता में निम्नरूप से मिलता है   :



वीर बावन  नारसिंह -दुध्याधारी नारसिंह ओचाली  नरसिंह कच्चापुरा नारसिंह नो तीस  नारसिंह -सर्प नो वीर नारसिंह -घाटे  कच्यापुरी  नरसिंह - -चौडिया नरसिंह- पोडया नारसिंह - जूसी  नारसिंह -चौन्डिया  नारसिंह कवरा नारसिंह-बांदू  बीर  नारसिंह- ब्रजवीर नारसिंह खदेर वीर नारसिंह - कप्पोवीर नारसिंह -वर का वीर नारसिंह -वैभी नारसिंह घोडा नारसिंह तोड्या नारसिंह -मणतोडा  नारसिंह चलदो नार सिंह - चच्लौन्दो   नारसिंह ,मोरो  नारसिंह लोहाचुसी  नारसिंह मास भरवा नारसिंह ,माली  पाटन नारसिंह पौन घाटी नारसिंह केदारी नारसिंह खैरानार सिंह सागरी नरसिंह ड़ोंडिया नारसिंह बद्री का पाठ थाई -आदबद्री छाई-हरी हरी द्वारी नारसिंह -बारह हज़ार कंधापुरी को आदेश-बेताल घट  वेल्मुयु भौसिया -जल मध्ये नारसिंह -वायु मध्ये  नार सिंह वर्ण मध्ये  नार सिंह   कृष्ण अवतारी नारसिंह घरवीरकर नारसिंह रूपों नार सिंह पौन धारी नारसिंह जी सवा गज फवला  जाणे-सवा मन सून की सिंगी जाणो तामा पत्री जाणो-नेत पात की झोली जाणी-जूसी मठ के वांसो  नि पाई  शिलानगरी को वासु  नि पाई (साभार सन्दर्भ डॉ. रणबीर  सिंह चौहान कृत " चौरस   की धुन्याल से " , पन्ना १५-१७)   

   
     

इसके साथ नारसिंह देव ने अपने राजकाज   का संचालन करने और ५२ नारसिंह  को मदद करने हेतु  ८५ भैरव भी  नियुक्त  स्थापित किये इसके अलावा कईं  उपगढ़ भी स्थापित   किये   गए जिनके बीर भडौं गंगू रमोला,लोधी रिखोला  ,सुरजू कुंवर ,माधो सिंह भंडारी ,तिलु रौतेली ,कफ्फु चौहान आदि के उत्तराखंड में आज भी जागर गीतौं -पवाड़ों  में यशोगान होता है |

                                                                     

                                        " सागर ताल गढ़ विजय गाथा "



इन्ही गढ़ों में से एक "सागर ताल गढ़ " गढ़ों के इतिहास में प्रमुख  स्थान रखता है जो कि भय-संघर्ष और विजय युद्ध रूप में उत्तराखंड के भडौं कि बीरता का साक्षी रहा है जो कि सोंन  नदी और रामगंगा के संगम पर कालागढ़ (काल का गढ़ ) दुधिया चोड़,नकुवा ताल आदि नामों से भी जाना जाता है | तराई -भावर का यह क्षेत्र तब माल प्रदेश के नाम से जाना  जाता था | उत्तराखंड के प्रमुख कत्युरी इतिहासकार डॉ० चौहान    के अनुसार यह लगभग दो सो फीट लम्बा   और लगभग इतना ही चौड़ा टापू पर बसा एक सात खण्डो का गढ़ था जिसके  कुछ खंड जलराशि में मग्न थेय  जिसके अन्दर ही अन्दर खैरा-  गढ़ (समीपस्थ  एक प्रमुख  गढ़ ) और रानीबाग़ तक सुरंग बनी हुयी थी | स्थापत्य   कला में  में सागर ताल गढ़ गढ़ों में   जितना अनुपम था उतना ही भय और आतंक के लिये भी जाना जाता था | सागर ताल गढ़ गाथा का प्रमुख  नायक  लखनपुर के कैंतुरी राजा  प्रीतम देव(पृथिवी पाल  और पृथिवी शाही आदि नामों से भी जाना जाता है ) और मालवा से हरिद्वार  के समीप आकर बसे  खाती क्षत्रिय राजा झहब राज कि सबसे छोटी पुत्री मौलादई (रानी जिया और पिंगला रानी आदि नाम  से भी जानी ज़ाती है  ) का नाथ सिद्धों और  धाम  यात्राओं के पुण्य से उत्पन्न प्रतापी पुत्र   धामदेव था | रानी जिया धार्मिक स्वाभाव कि प्रजा कि जनप्रिय रानी थी ,चूँकि रानी जिया के अलावा राजा पृथिवी पाल   कि अन्य बड़ी रानिया भी थी जिनको धामदेव के पैदा होते ही रानी जिया से ईर्ष्या होने लगी | धीरे धीरे धामदेव बड़ा होने लगा | उस समय माल-सलाँण अक्षेत्र   के सागर ताल गढ़ पर नकुवा और समुवा का बड़ा आतंक रहता था जो सन् १३६०-१३७७ ई ०   के मध्य  फिरोज तुगलक के अधीन आने के कारण  कत्युरी राजाओं के हाथ  से निकल गया था जिसके बाद से समुवा मशाण जिसे साणापुर (सहारनपुर ) कि " शिक" प्रदान कि गयी थी का   आंतंक चारो तरफ छाया हुआ था ,समुवा स्त्रियों  का अपरहण करके सागरतल गढ़ में चला जाता था ,और शीतकाल में कत्युरी राजाओं  का भाबर  में पशुधन  भी लुट लेता था , चारो और समुवा समैण  का आतंक मचा रहता था |



इधर कत्युरी राजमहल में रानी जिया और धाम देव के विरुद्ध  बाकी रानियौं द्वारा साजिश का खेल सज रहा था | रानियों ने धामदेव को अपने रास्ते से हटाने कि चाल के तहत राजा पृथ्वीपाल  को पट्टी पढ़ानी  शुरू कर दी और   राजपाट के  के बटवारे में रानीबाग से सागरतल गढ़ तक का भाग रानी जिया को दिलवाकर और राज को मोहपाश में बांध कर धामदेव को सागर ताल गढ़ के अबेध गढ़ को साधने हेतु उसे  मौत के मुंह  में भिजवा दिया |



पिंगला रानी माता जिया ने गुरु का आदेश मानकर विजय तिलक कर पुत्र धाम देव को ९ लाख कैंत्युरी सेना और अपने मायके  के बीर भड ,भीमा- पामा कठैत,गोरिल राजा (जो कि गोरिया और ग्वील भी कहा जाता है और जो  जिया कि बड़ी बहिन  कलिन्द्रा  का  पुत्र था ),डोंडीया  नारसिंह और भेरौं शक्ति के वीर बिजुला नैक (कत्युर राजवंश कि प्रसिद्ध राजनर्तकी छ्मुना -पातर का पुत्र ) और निसंग महर सहित सागर ताल गढ़  विजय हेतु प्रस्थान का  आदेश दिया |



धाम कि सेना ने सागर ताल गढ़ में समुवा को चारो और से घेर लिया ,इस बीच धामदेव को राजा पृथ्वीपाल कि बीमारी का समाचार मिला और उसने निसंग महर को सागर ताल को घेरे रखने कि आज्ञा देकर लखनपुर कि और रुख किया और रानियों को सबक सिखाकर लखनपुर कि गद्धी कब्ज़ा कर वापिस सागर ताल गढ़ लौट आया जहाँ समुवा कैंत्युरी सेना के भय से सागर ताल गढ़ के तहखाने में घुस गया था | ९ लाख  कैंत्युरी  सेना के सम्मुख

अब समुवा समैण छुपता फिर रहा था | गढ़ के तहखानों में भयंकर  युद्ध छिड़ गया  था और  खाणा और कटारों  कि टक्कर से सारा सागर ताल गढ़ गूंज उठा था |युद्ध में समुवा समैण मारा गया नकुवा को गोरिल ने जजीरौं  से बाँध दिया  और जब बिछुवा कम्बल ओढ़ कर भागने लगा तो धाम देव ने उस पर कटार से  वार कर उसे घायल कर दिया |चारो और धामदेव कि जय जयकार होने लगी | जब धामदेव ने गोरिल से  खुश होकर कुछ मागने  के लिये कहा तो गोरिल ने अपने पुरुष्कार में कत्युर कि राज चेलियाँ मांग ली जिससे धामदेव क्रुद्ध हो गया और गोरिल नकुवा को लेकर भाग निकला परन्तु भागते हुए धाम देव के वर से उसकी टांग घायल  हो गयी  थी | गोरिल ने नुकवा को लेकर खैरा  गढ़ कि खरेई पट्टी के सेर बिलोना  में कैद कर लिया जहाँ धामदेव से उसका फिर युद्ध हुआ और नकुवा उसके हाथ से बचकर धामदेव कि शरण  में आ गया और अपने घाटों  कि रक्षा का भार देकर धामदेव ने उसे प्राण दान दे  दिया  परन्तु बाद में जब नकुवा फिर अपनी चाल पर आ गया तो न्याय प्रिय  गोरिया (गोरिल )  ने उसका वध कर दिया  |



सागर ताल गढ़ विजय  से धामदेव कि ख्याति दूर दूर तक फ़ैल चुकी थी और मौलादेवी अब कत्युर वंश कि राजमाता मौलादई के नाम से अपनी कत्युर का राज चलाने  लगी | धामदेव को दुला शाही  के नाम से भी जाना जाता था वह कत्युर का मारझान (चक्रवर्ती ) राजा था और उसकी राजधानी वैराठ-लखनपुर थी उसके राज में सिद्धों का पूर्ण  प्रभाव  था और दीवान पद पर महर जाति के वीर   ,सात भाई निन्गला कोटि और सात भाई पिंगला कोटि  प्रमुख थे |



धामदेव अल्पायु में कि युद्ध करते हुए शहीद  हो गया था परन्तु उसकी सागर ताल गढ़ विजय का उत्सव आज भी उसके भगत जन धूमधाम से मानते है वह कत्युर वंश में प्रमुख  प्रतापी राजा था जिसके काल को कत्युर वंश का स्वर्ण काल कहा जाता है जिसमे अनेकों मठ मंदिरों का निर्माण हुआ ,पुराने मंदिरों को जीर्णोद्धार किया गया  और जिसने अत्याचारियों  का अंत किया |



वीर धाम देव तो भूतांगी होकर चला गया परन्तु आज भी सागर ताल  विजय गाथा उसकी वीरता का बखान करती है और कैंतुरी पूजा में आज भी उसकी खाणा और कटार पूजी ज़ाती है | कैंतुरी  वार्ता में "रानी जिया कि खली म़ा नौ लाख कैंतुरा  जरमी गयें " सब्द आज भी कैंतुरौं मैं जान फूंक कर पश्वा रूप में अवतरित हो जाता है और युद्ध सद्रश   मुद्रा में  नाचने लगता है धामदेव समुवा को मरने कि अभिव्यक्ति देते हैं तो नकुवा  जजीरौं  से बंधा होकर धामदेव से अनुनय विनय कि प्रार्थना करने लगता है तो विछुवा को  काले कम्बल से छुपा कर  रखा जाता है | इसके उपरान्त समैण पूजा में एक जीवित सुकर  को

गुफा में बंद कर दिया जाता है और रात में  विछुवा समैण को अष्टबलि   दी ज़ाती है जो कि घोर अन्धकार में सन्नाटे  में  दी ज़ाती है और फिर चुप चाप अंधेरे में गड़ंत करके बिना किसी से बात किये  चुपचाप आकर एकांत में वास  करते हैं और तीन दिन तक ग्राम  सीमा से बहार प्रस्थान नहीं करते अन्यथा समैण लगने का भय बना रहता है | धामदेव कि पूजा के विधान से ही समुवा कि क्रूरता और उस काल में उसके भय का बोध होता है | उसके बाद दल बल के सात  और शस्त्र और वाद्या  यंत्रों के सात जब गढ़ के समीप  दुला चोड़ में धामदेव कि पूजा होती है तो धामदेव का पश्वा और ढोल वादक गढ़ कि गुफाओं में दौड़ पड़ता  है   और तृप्त होने पर स्वयं जल से बहार आ जाता हैं उसके बाद बडे धूम धाम-धाम  से रानी जिया कि रानीबाग स्थित  समाधि "चित्रशीला " पर एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है |



अब इसे वीर भडौं कि वीरता का प्रभाव कहें या गढ़-कुमौनी वीरों  कि वीरता शोर्य और बलिदानी इतिहास लिखने कि परम्परा  या फिर मात्रभूमि के प्रति उनका अपार पर स्नेह ,कारण चाहे जो भी हो पर आज भी उत्तराखंडी बीर अपनी भारत भूमि कि रक्षा के लिये कफ़न बांधने वालौं  में सबसे आगे खडे नज़र आते है फिर चाहे  वह चीन के अरुणाचल सीमा युद्ध का "जसवंत बाबा " हो पाकिस्तान युद्ध के अमर शहीद ,या विश्व युद्ध के फ्रांस युद्ध के विजेता या  " पेशावर क्रांति " के   अग्रदूत  " वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली " ,या कारगिल के उत्तराखंडी रणबांकुरे  या अक्षरधाम और मुंबई हमलों में  शहीद म़ा भारती के अमर सपूत सब आज भी उसी   " वीर  भोग्या  बसुन्धरा " कि परम्परा का निर्वाहन कर रहे हैं |




संदर्भ ग्रन्थ :  उत्तराखंड के वीर भड , डा ० रणबीर सिंह चौहान
                    गढ़वाल के गढ़ों का इतिहास एवं पर्यटन के सौन्दर्य स्थल  ,डा ० रणबीर सिंह चौहान
                    ओकले तथा गैरोला ,हिमालय की लोक गाथाएं 
                    यशवंत सिंह कटोच -मध्य  हिमालय का पुरातत्व
विशेष आभार : डॉ. रणबीर सिंह चौहान, कोटद्वार  (लेखक और इतिहासकार ) ,माधुरी रावत जी
स्रोत :म्यार ब्लॉग हिमालय क़ी गोद से (गीतेश सिंह नेगी.सिंगापूर प्रवास से )


गढ़वाली कविता : केर


क्षेत्रवाद 

जातिवाद 
भ्रष्टाचार
मेहंगैई   

बेरोजगरी  
अशिक्षा 
और पलायन 
ज़रा बंधा धौं
केर यून्की
पहाड़ म़ा 

अगर बाँध सक्दो त ?  

रचनाकार : (गीतेश सिंह नेगी ,सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार सुरक्षित)        

गढ़वाली कविता : गोर


कक्खी  धरम का 
कक्खी  जाति का 
त कक्खी खोख्ला रीति-रिवाजौं का
कक्खी अमीरी का
त कक्खी गरीबी का
सब्युं का छीं
अपडा -अपड़ा ज्युडा
अपड़ा -अपड़ा कीला
और अपड़ा -अपड़ा गोर
बन्धियां सांखियौं भटेय |  

रचनाकार : ( गीतेश सिंह नेगी ,सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार सुरक्षित )

Sunday, May 15, 2011

गढ़वाली व्यंग :विधान सभा म़ा खच्चर



उत्तराखंड मा विधान सभा का चुनाव की घोषणा व्हेय ग्या छाई और पक्ष और विपक्ष अपड़ी - अपड़ी रणनीति बणाण  फ़र लग्याँ छाई | पार्टी अध्यक्ष द्वारा कार्यकर्ताओं और पार्टी का बड़ा वक्ताओं थेय झूठा  सौं -करार और सुप्निया दिखाणं का भारी हुकुम सदनी की  चराह  आज भी जारी हुयां छाई | उन्भी उन्थेय याक़ी अब आदत सी व्हेय गया छाई |
सब कुछ ठीक ठाक  से चलणु छाई पर अचांणचक  से  ब्याली भटेय पक्ष -विपक्ष   दुयुं की नीद उड़ीं छाई |

अब साब बात इन् व्हाई की ये  चुनाव मा एक और गुट खडू व्हेय ग्या छाई | अरे भाई कैल बनाई यु गुट ?  और आखिर कब ? पक्ष -विपक्ष येही   सोच विचार करण फ़र लग्याँ छाई |
त़ा भई- बंधो   बात इन्  छाई की गौर- भैंषा ,बल्द , बाघ-बखरा  , कुक्कुर -बिरोला , मूस्सा सब जानवर सरकार से सान्खियुं भटेय तंग त हुयां हि छाई  सो उन्  मिल-जुली एकजुट व्हेय की अपड़ी कौम का विगास  का खातिर चुनोव्   मा भाग लिणा  कु फैसला कैर द्या |

अब साब किल्लेय  की  पहाड़ मा मन्खी  त उन् भी अब कम हि रैंदी ,भंडिया लोग  अब प्रवास   कु सुख  जू भोगंण लग्यां छिन्न पर यूँ  गौर- भैंसों ,बल्द, बाघ-बखरौं ,कुक्कुर -बिरोलौंल कक्ख  जाणू  छाई यूँ डांडीयूँ कांठीयौं और गौं गुठियारौं , धार-पन्द्यरौं थेय छोडिकी और यु नेताओं कु ध्यान सौर नम्मान त़ा देहरादूण और दिल्ली
जने हि रैंद  और देहरादूण  मा भी कुछ नेता जोड़ -तोड़  और  " गढ़वाल कुमाओं " थेय मरोड़  मा हि लग्याँ रैंदी त कुछ सता - सुख भोगिकी अब पहाड़ विरोधी मानसिकता का भी व्हेय गईँ पहाड़ कु ख्याल यूँ  निर्भगियुं  थेय  सिर्फ और सिर्फ चुनोव्  का बगत मा हि आन्द नथिर यु  अशगुनी लोग इन्हेय  खुण कभी पैथिर फरकि की भी नी देख्दा और ता और पहाड़ी और पहाड़ से जुड़याँ  राजनेतिक और सामाजिक सरोकारों से भी यूँ थेय  अब कुछ लीणु दीणु नी रैंदु  उलटू पिछला दस बरसों मा यून्की विगास योजना - निति पहाड़ विरोधी मानसिकता कु  जैर से फूंकी पिल्चिं रें |

खैर नया दल कु गठन हूँण से पहाड़ म़ा बस्याँ मनखियुं थेय  भी नयी आस का सुपिन्या जगण बैठी  गईं ,पुराणा सबहि दल त उन् अच्छी तरेह से देख-चाखि याली छाई जौंकू लूँण-कटट स्वाद अभी तक उनकी जीभ म़ा लग्णु छाई ,कत्गौं थेय त भारी मरच भी लगणि छाई की दस साल म़ा क्या सोवाचु  छाई और अब  क्या हुणु  च ,कुई राजधानी का नाम फर पक्ष- विपक्ष थेय  कचोरणु  छाई त कुई पलायन और रोजगार   का नाम फर , त कुई डामौ की डम्याँण की पीड़ा का आंशु पुटुग ही पुटुग धोल्णु राई, पर निर्भगी पक्ष -विपक्ष का यु नेता जू थेय  यूँ लोगुन्ल  सैंत -पालिकी दिल्ली  और देहरादूण  कु रास्ता दिखाई वी आज पहाड़ कु रास्ता और पहाड़  का सुपिन्या  बिसरी   गईं ,बिसरी गईं सखियुं कु खैर और पीड़ा का वू दिन  ,मसूरी ,श्रीनगर, पौड़ी ,खटीमा देहरादून , मुज़फर नगर का वो दिन जब हमुल एकजुट वही की दगड़ म़ा  गीत लगई छाई ,धई लगाई  छाई ,गोली और लठ्याव् सैह  छाई | दिल्ली कु जन्तर मंतर का अन्दोलन काल का दिन भी यु सत्ता  सुख भोगी लोग चुक्कापटट कै की  बिसिर गईं  |

अब साब  पहाड़ म़ा गठित ये  नया दल का घोषणा पत्र म़ा डांडा काँठीयूँ   का समग्र पहाड़ी विकास की नयी धार साफ़ दिखेणी छाई ये  ही कारण से पहाड़  का  रैंवाशियुं और प्रेमी प्रवासियुं   कु भारी  समर्थन यूँ थेय  मिलणु छाई और पक्ष-विपक्ष   खुण भारी मुश्किल खड़ी व्हेय ग्या  छाई ,उन्ल  साम -दाम दंड भेद सभी निति अपनै पर उन्की एक नी चली और सत्ता पहाड़  का यूँ न्या क्रांतिवीरों का हत्थ म़ा ऐय ग्या |

भाई बंधो इन्ह  नै  पार्टी कु  काम-काज  कु  तरीका भी बिल्कुल अलग छाई ,उन्ल पक्ष - विपक्ष का जण कसम खाण से पहली देहरादूण म़ा अपड खुट्टा  नी राखा       बल्कि उन्ल पहली शहीद  स्मारक म़ा जैकी शहीदों  थेय श्रद्धान्जली   अर्पित कैरी  और उन्का खैरी स्वुप्नियों थेय  सम्लैकी देहरादूण की और अप्डू रुख कार | शपथ   समारोह भी बिलकुल  पहाड़ी रूप म़ा संपन्न व्हेय और लोकभाषा म़ा शपथ लेकी उन्ल अप्डू और अप्डी भाषा  दुयुं कु मान -सम्मान कार |

सभ्युंल  मिली जुली की यु फैसला कार की  " प्रजा " खच्चर  थेय राज्य कु मुख्यमंत्री कु पद दिए जाव किल्लेकी  प्रजा थेय  गढ़-कुमौं की पहाड़ की धार धार और उन्कि हर खैर - विपदा  कु भोत ज्ञान छाई और पहाड़ से वेय  थेय  भोत गहरू प्रेम भी छाई ,वेक बाद पहाड़  कु रक्षा कु  भार भोटू कुक्कुर थेय  और संपदा और संपत्ति विभाग बिरोलू  थेय  दिये ग्याई ताकि चंट चालाक  बिरोलू राज्य की परिसम्पतियुं कु ठीक से सोक संभाल कैरी साक नथिर पिछला दस बरसौं बठिं लगातार राज्य की परिसम्पत्तियुं कु भारी नुक्सान यूँ  निकम्मों का कारण से हुणु  छाई | राज्य म़ा बेरोजगारी हटाणा  कु जिम्मा ईमानदार  और कर्मठ हीरू बल्द थेय  दीये  ग्याई और धरम पर्यटन और संस्क्रती कु जिम्मा "बिंदुली गौडी " थेय और राज्य का वित्त मंत्री कु पद स्याल महाराज थेय मिल और जंगल का राजा थेय  विधान सभा कु अध्यक्ष कु पद दीये  ग्याई |

जब प्रजा पहली दिन
विधान-सभा म़ा पहुँच त़ा साब क्या ब्वन ,एक से बड़ा एक विपक्षी नेता बैठक म़ा शामिल  हुण खुण  अयां छाई| कुई अप्थेय नरन्कार कू सी पुजरू चिताणु छाई  त़ा कुई अप थेय नो छम्मी  नारायण बताणु छाई | एक नेता साब बार बार खडू व्हेय की प्रवचन  सी दींण   बैठी जाणु राई त एक तबरी बीच बीच म़ा शंख बजा  दिणु राई और जब कुई वे म़ा पुछ्णु की भाई सिन्न किल्लेय  कन्नू छई त उ सर पितली गिच्ची कैरी की कबिता पाठ सी कैरी की बोल दिणु राही की मी त कुछ भी गलत नी करणु छोवं मी फर शक  नी कारा या मी त नाम से बिना शंख कु छोवं | एक नेता साब निछंद   व्हेय की भट्ट भूजण  म़ा लग्युं छाई और दगड़ा दगड धेई लगाणु  राई  की भट्ट ले लो ,  भट्ट ले लो | एक नेता ईनू भी छाई जो अपखुण बार बार गुणा , बार बार गुणा बोल्णु  छाई  त एक नेता कपूर जालंण म़ा ही लग्युं छाई और एक नेता हड़का ही मरण म़ा लग्युं छाई , कुल मिला कै काम की बात कुई नी  करणु छाई  |               

पर साब अब राज-काज त प्रजा का हत्थ म़ा छाई   वैल  पहली चोट म़ा  विपक्ष थेय  धराशाई कैर द्याई  और राज्य की जनता की जिकुड़ी से जुड़याँ  हर पहलु और मुद्दा फर गहराई से चर्चा और सोच बिचारी की फैसला कार और राज्य म़ा पलायन रोको योजना बणे की रोजगार उन्मुखी शिक्षा प्रणाली लागू  कैरी की पहाड़ की भोगोलिक और पारिस्थितिकी का हिसाब से उधोग निति कु निर्माण कार ज्यान्कू  ज्यादा से ज्यादा  लाभ नेतौं - ठेकादारौं थेय  ना मिली की पहाड़ का शिक्षित बेरोजगारों थेय  मिल साक | शिक्षा का वास्ता वैल  पहाड़ का प्रति समर्पित और कर्मठ शिक्षकों कु चयन कार ना की मजबूर बेबस और लाचार बधवा  मजदूरों कु | पर्यटन का क्षेत्र  म़ा यूँल ग्रामीण क्षेत्र म़ा पर्यटन  विकास  योजना लागू कैरी की पहाड़ का गौं गौं थेय आधुनिक संचार का माध्यमों से सजा -सवांर द्याई  ,कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य कैर द्याई  और हर ब्लाक म़ा आधुनिक अस्पताल बणवा  द्याई |

पहाड़ म़ा उन्नत कृषि विकास और अनुसंधान योजना का तहत  युंल गौं गौं म़ा माट-खैड की जांच करवाई  और वेका बाद  किसानों थेय  उन्नत बीज  और ब्वई -बूतै  का  आधुनिक तरीकों कु  प्रशिक्षण  द्याई और दगड़ा दगड फसल- फल -फूल और जड़ी बुटयूँ  कु एक अच्छु और गलादारौं से रहित  बाज़ार उन्थेय द्याई  | राज्य का दूर दराज का पहाड़ी गौं -धार म़ा उन्ल बिजली -पाणी -मोटर पहुंचाई द्याई और भ्रस्टाचारी और गलादार किस्म का अफसरौं फर  ज्यूडा - संगला बाँध  दयीं  |   
  
उन्ल राज्य की लोक-कला संस्कृति -भाषा और रीती -रिवाजौं थेय भोरिकी  सम्मान दिणा का साथ देश विदेश प्रवास म़ा बस्यां पहाड़ का अनुभवी लोगौं थेय  पहाड़ का विकास  म़ा एथिर आण खुण धाद भी मार जुकी फिल्म उद्योग ,व्यापार  ,पर्यटन और शिक्षा ,चिकित्सा और कुटीर उद्योग क्षेत्र म़ा विशेष  दक्षता और अनुभव प्राप्त लोग छाई |

उन्कि लोकप्रियता दिन रात बढदा ही जाणि छाई ज्यां से  विपक्ष थेय  भारी मुंडरु  उठ्युं छाई और जब भटेय प्रजा ल   उत्तराखंड की राजधानी का मुद्दा फर  तैड-फैड करणी शुरू कार त़ा विपक्ष का मुख फर तब भटेय  झमक्ताल रुमुक्ताल सी प्वड़ी ग्याई  ,जक्ख द्याखा   प्रजा की जय जयकार हुणि छाई  | आज विपक्ष का हर पहाड़ी नेता थेय   भोत अफसोश  सी हुणु च और  वू  सोच म़ा प्वडयाँ छीं की जू काम  प्रजा खच्चर करणु च उन्  हमुल किल्लेय्य   नी कारू उन्थेय  अपनाप से घिण  सी आणि छाई  और जू ब्याली तक सदनी लोग - बागौं की भीड़ से घिरयाँ रेंदा छाई उन्थेय अब भीड़ म़ा जाण म़ा भी शर्म सी आणि छाई  |
पर लोग अब भोत खुश छीं और बुना छीं की यूँका राज से त़ा प्रजा कु राज भोत भोत बढिया चा ,काश दस बर्ष   पैल्ली प्रजा जन्नु नेता मंत्री बणदू त आज हमारू उत्तराखंड और भी ज्यादा  ठाठिलू और छजिलू  राज्य हुन्दू | 
पर  खैर कुई बात नी च अबही भी देर नी व्हाई,प्रजा - सरकार जागरुक रैली त विगास का सबही सुपिन्या एक ऩा एक दिन जरूर पूरा  व्हाला |
इन्नेह प्रजा की जय जयकार अबही भी हूँण लगीं छाई और विपक्षी मुख लुका की अपड़ा अपड़ा दोलणो  पुटुग भटेय मजबूर  और लाचार व्हेय की देखण लाग्यां छाई
की अब क्या व्हालू ,कक्खी भोल  प्रजा राजधानी का मसला फर भी अप्डू गिच्चू त नी खोली द्यालू ?    



(नोट : इस व्यंग के सबही पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं ,यदि कहीं कुछ भी  ऐसा घटित होता है या  हो रहा है तो उसे महज  एक संयोग मात्र  ही समझा  जाये )

रचनाकार : ( गीतेश सिंह नेगी ,सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार  सुरक्षित )
स्रोत :         ( म्यार ब्लॉग हिमालय की गोद से ,  )