हिमालय की गोद से

हिमालय  की  गोद  से
बहुत खुबसूरत है आशियाना मेरा ,है यही स्वर्ग मेरा,मेरु मुलुक मेरु देश

Saturday, May 14, 2011

गढ़वाली कविता : क्या व्हालू ?

गढ़वाली कविता  : क्या व्हालू  ?

जक्ख रस अलुंण्या राला
और निछैंदी मा व्हाला छंद
कलम होली कणाणि दगडी
वक्ख़ लोक-भाषा और साहित्य कु
क्या व्हालू  ?


जक्ख  अलंकार उड्यार लुक्यां राला 
और शब्दों  फ़र होली शान ना बाच
जक्ख गध्य कु मुख टवटूकु हुयुं रालू
और पद्य की हुईं रैली फुन्डू पछिंडी
वक्ख़  लोक -भाषा और साहित्य कु
क्या व्हालू  ?  


जक्ख जागर ही साख्युं भटेय सियाँ राला
और ब्यो - कारिज मा  औज्जी
दगडी ढोल-दमो अन्युत्याँ  राला
वक्ख़ लोकगीत तब बुस्याँ -हरच्यां हि त राला  
और बिचरा लोग -बाग तब  दिन -रात
वक्ख़ मंग्लेर ही  खुज्याणा  राला
वक्ख़  लोक -भाषा और साहित्य कु
क्या व्हालू  ?
वक्ख़  लोक -भाषा और साहित्य कु
क्या व्हालू  ?



रचनाकार : ( गीतेश सिंह नेगी ,सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार  सुरक्षित )
स्रोत :         ( म्यार ब्लॉग हिमालय की गोद से )

Wednesday, May 11, 2011

गढ़वाली कविता : किरांण

गढ़वाली  कविता : किरांण   
मिथये अचांणंचक  से ब्याली सोच प्वड़ी गईँ             
किल्लेय कि  कुई  कणाणु   भी छाई 
फफराणु  भी
छाई
द्वी चार  लोगौं का नाम लेकि 
कबही  छाती  भिटवल्णु
कबही रुणु   भी छाई
बगत बगत फिर उन्थेय  सम्लौंण भी  लग्युं छाई  
तबरी झणम्म 
से कैल
म्यार बरमंड का द्वार भिचौल द्यीं
सोचिकी मी खौलेय सी ग्युं
कपाल  पकड़ी  कि अफ्फी थेय  कोसण बैठी ग्युं
सोच्चण 
बैठी ग्युं  कि झणी  कु व्हालू  ?
मी कतैइ  नी  बिंगु
मिल ब्वाल - हैल्लो  हु आर यू ?
मे  आई  हेल्प यू ?
वीन्ल रुंवा सी गिच्चील ब्वाळ
निर्भगी  घुन्डऔं -
घुन्डऔं  तक फूकै  ग्यो
पर किरांण  अज्जी तक नी ग्याई ?
मी तुम्हरी लोक भाषा छोवं
मेरी  कदर और  पछ्याँण
तुम थेय अज्जी तक नी व्हाई  ?
सुणि  कि  मेरी संट मोरि ग्या
और मेरी  जिकुड़ी  थरथराण बैठी ग्या
 मी डैर सी ग्युं
और चदर पुटूग मुख लुका कि
स्यै ग्युं
चुपचाप से
और या बात मिल अज्जी तक कैमा नी बतै
और बतोवं  भी  त कै गिच्चल बतोवं ?
कन्नू कै
बतोवं ? कि  मी गढ़वली त  छोवं
पर मिथये
गढ़वली नी आँदी ?
पर मिथये गढ़वली नी आँदी ?

 

रचनाकार : (गीतेश सिंह नेगी ,सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार सुरक्षित )

Monday, May 9, 2011

गढ़वाली कविता :द्वी अक्तूबर

द्वी  अक्टुबर

गांधी का देश मा
हुणी च आज गाँधी वाद की हत्या
बरसाणा  छीं  शस्त्र- वर्दी धारी
निहत्थौं फर गोली - लट्ठा
सिद्धांत कीसौं मा धैरिक
भ्रस्टाचारी व्हे ग्यीं यक्ख सब सत्ता 
जौलं दिखाणु छाई बाटू सच्चई कु
निर्भगी वू अफ्फी बिरडयाँ छीं रस्ता
ईमानदरी मुंड -सिरवणु  धैरिक नेता यक्ख 
तपणा छीं घाम बणिक संसदी देबता
दुशाषण  खड़ा छीं बाट -चौबटौं  मा द्रोपदी का 
और चुल्लौंह मा  हलैय्णी चा  सीता अज्जी तलक
और गाँधी वाद बणयूँ चा सिर्फ विषय शोध कु
बणी ग्यीं  कत्गे कठोर मुलायम  गाँधी-वादी वक्ता
अब तू ही बता हे बापू !
द्वी अक्टुबर खुन्णी जलम ल्या तिल एक बार
किल्लेय  हुन्द बार बार यक्ख
 द्वी अक्टुबर खुण फिर गांधीवाद  की हंत्या ?
निडर घुमणा छीं हत्यारा  
लिणा छीं सत्ता कु सुख  
न्यौं  सरकारौं कु धरयुं च मौन
और लुकाणा छीं गांधीवादी  मुख
और  किल्लेय  गांधीवाद  यक्ख
न्यौं -अहिंसा का बाटौं मा  लमसट्ट हुयुं च
और मिल त यक्ख तक  सुण की अज्काळ    
गाँधी का देश मा
गांधीवाद थेय  आजीवन कारावास  हुयुं च   ?
गांधीवाद थेय  आजीवन कारावास  हुयुं च   ?
गांधीवाद थेय  आजीवन कारावास  हुयुं च   ?

(उत्तराखंड आन्दोलन के अमर शहीदों को इस आस  के साथ समर्पित  की एक दिन उन्हे इन्साफ जरूर मिलेगा और उनका समग्र विकास का अधूरा स्वप्न एक दिन जरूर पूरा होगा )

रचनाकार : ( गीतेश सिंह नेगी ,सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार सुरक्षित )
 

Sunday, May 8, 2011

गंगनाथ जागर का सार

  गंगनाथ  जागर का सार (गंगनाथ और भाना की अमर प्रेम -गाथा ) 

अस्त्युत्तरस्याम दिशी देवतात्मा .हिमालयो नाम नगाधिराज :,
 पूर्वापरो तोयनिधि वगाह्या ,स्थित :पृथिव्याम एव मानदंड : ||  

महाकवि कालिदास के  कुमारसंभव के  उपरोक्त श्लोक पर्वत राज हिमालय की  अजर -अमर  और  विस्तृत प्राकृतिक ,बोधिक ,सामाजिक और सांस्करतिक विरासत की महता को समझने  के लिये भले ही पर्याप्त हो परन्तु नगाधिराज हिमालय के विविध और बहुआयामी सांस्करतिक  सोपानों  का वास्तविक रसपान  करने हेतु हिमालयी संस्कर्ति और जीवन शैली के सागर में ठीक वैसे ही गोता लगाना होगा  जैसे की  महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने लगाकर  अनुभव किया था शायद उन्हे और " चातक " जैसे  प्रकृति के हर  चितेरे को हिमालय की हर श्रृंखला पर ,हर नदी घाटी पर  और हर एक  मठ -मंदिर  पर  जीवन और संस्कृति के विविध रंगों का रंग देखने को मिला हो | इस हिमालय की झलक ही ऐसी है ,ना जाने कितने लोग यहाँ आकर इसके देवत्व में लींन होकर घुमक्कड्  और बैरागी हो गए तो  ना जाने कितने लोगौं में  यहाँ आकर फिर से जीने की शक्ति का संचार हुआ |वेद -उपनिषद और   पुराण  और ना जाने क्या क्या लिखा गया पर हिमालय कहीं भी अतीत में  पूर्ण रूप से समाया नहीं जा सका और शायद ना ही यह  भविष्य में कभी  समाया जा सकेगा | एक जीवन में तो हिमालय के एक भाग का ही रसपान करना असंभव प्रतीत होता है | इसी पर्वत राज हिमालय का एक मुकुट मणि देब भूमि उत्तराखंड अपनी वैदिक -पुराणिक-अध्यात्मिक और अनुपम सांस्करतिक और  प्राकर्तिक धरोहर के लिये विश्वविख्यात है | वेदों पुराणों में उत्तराखंड को केदारखंड (गढ़वाल ) और मानसखंड (कुमायूं )के नाम से तो जाना ही जाता है परन्तु इसकी प्रत्येक  घांटी ,गंगा -यमुना सहित इसकी प्रत्येक  नदी - धारा , जीवन को एक निराले ही अंदाज  से देखने और  स्वयं  में आत्मसात   करने का निमंत्रण अवसर  देती है | इसकी प्रत्येक पहाड़ी पर होने  वाला शंखनाद अपने पीछे एक पुराणिक और ऐतिहासिक ज्ञान बोध के अनुनाद का आभास कराता    है तो इसका प्रत्येक लोक- गीत कहीं ना कहीं जीवन में एक सुखद अनुभूति के साथ झुमने का अहसास देता है | देवभूमि का  प्रत्येक  गीत चाहे वहां "झुमेलो " गीत हो चाहे वह " बसंती " गीत हो या फिर " चैती " गीत हो सभी  मनुष्य और प्रकृति के भावनात्मक सम्बन्धों  की सुरमयी अभिव्यक्ति देते हैं तो वहीं दूसरी और खुदेड गीत अतीत के सुखद ,वर्तमान के वियोग के करुण और निकट   भविष्य में आस मिलन की  सुखद भाव को प्रतिबिंबित करते हैं तो तीसरी और देव आहवाहन के विभिन्न " जागर गीत " उत्तराखंड के विभिन्न देवी देवताओं के अपने भगतों से संवाद के साक्षी बनकर उन्हे ढोल -दमो हुड़का और कंससुरी थाली पर थिरकने रीझने ,और सुख दुःख को उनसे साझा  करने  का दुर्लभ अवसर प्रदान करते हैं |
 इन्ही   जागर गीतों में सम्बंधित देवी -देबता के आवाहन के मंत्रो का लय बध समावेश होने के साथ अतीत और इतिहास के असंख्य घटनाक्रम  मंत्रो और गीत रूप मे सन्निहित होते हैं तथा प्रत्येक के आवाहन के मंत्र ,वाद्या यन्त्र , और पूजा की विधि भी अलग होती है और इनके मर्मज्ञ जिन्हे "जागरी " कहा जाता है वे भी पीढी दर पीढी  विशेष दक्षता लिये होते हैं | ये जागर गीत  उत्तराखंड की ना केवल धार्मिक आस्था  के   प्रतिक हैं अपितु ये  उसकी सामाजिक ,सांस्कृतिक ,साहित्यिक और ऐतिहासिक धरोहर के आधार स्तंभों में से एक हैं  |

  जागर गीतों के इस अथाह सागर में से एक जागर  "गंगनाथ जागर " के नाम से उत्तराखंड में जाना जाता हैं जो उत्तराखंड के कुमायूं  क्षेत्र में अपने आराध्य " गंगनाथ " और उसकी प्रेमिका " भाना " के आहवाहन के लिये लगाया जाता हैं जिसमे केवल  हुडके और कांसे की थाली का वाद्या  यन्त्र के रूप में प्रयोग होता हैं चूँकि गंगनाथ गुरु गोरखनाथ के चेले थे इसलिये जागर  में नाथ पंथी मंत्रो का प्रभाव स्पष्ट देखा  जा सकता है | 
गंगनाथ जागर में डोटी के कुंवर गंगनाथ के जन्म और उसकी  रूपवती प्रेमिका भाना के प्रेम प्रसंग और उनकी निर्मम हत्या का उल्लेख मिलता जो की सार रूप में निम्नवत हैं :

गंगनाथ जागर (गंगनाथ और भाना की करुण प्रेम गाथा ) का सार

डोटी के राजा वैभव चन्द धन धन्य से संपन थे परन्तु उन्हे और उनकी पत्नी प्योंला देवी को संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ था | संतान के वियोग में व्याकुल माता  प्योंला देवी ने शिव  की आराधना की ,शिव ने  प्रसन्न  होकर उन्हे स्वप्न  में दर्शन देये और कहा की यदि  प्योंला  घर के पास के  सांदंण  के  सुखे तने  पर सात दिन तक लगातार जल अर्पित करेगी और अगर सातवे दिन उसमे से एक खिलता हुआ फूल निकलेगा तो रानी को गर्भ ठहरेगा  और डोटी को अपना उत्तराधिकारी और उन्हे संतान का  मुख देखने को मिलेगा |  शिव  के आदेश से प्योंला रानी रोज रात-ब्याणी आने पर ही उठकर जल चढाती  ,राजा   वैभव चन्द को लगता की जैसे रानी संतान वियोग में पागल सी हो गयी है | अंतत  सातवे दिन सांदंण का फूल खिल उठा ,रानी प्योंला की प्रसन्ता का ठिकाना  नहीं था |कुछ दिन बाद माता प्योंला रानी को गर्भ ठहर गया और उसने एक सुन्दर, तेजवान और अदभुत बालक को जन्म दिया |

डोटी गढ़ में चारो ओर हर्ष की लहर दौड़ पड़ी | भगवन शिव के आशीर्बाद  से उत्पन्न  बालक का नाम गंगनाथ रखा गया ,राज ज्योतिष से  जब बालक के भविष्य की पूछ की गयी तो माता ओर पिता दोनों को सोच पड गए क्यूंकि ज्योतिष के अनुसार गंगनाथ १४ वर्ष बाद प्रेम -वियोग में जोगी हो जाएगा ओर डोटी को सदा के लिये छोड़ देगा |

समय के साथ गंगू बड़ा होने लगा ओर उसकी ख्याति एक दिव्य बालक के रूप में सम्पूर्ण डोटी में फैलने लगी |एक रात गंगू के स्वप्न में भाना का आना होता है ओर वह उसे अपने प्रेम वियोग के बारे में बता कर जोशी खोला (अल्मोड़ा ) आने की बात कहते है ओर कहती है की यदि वह अपनी माँ का सपूत होगा तो उससे मिलने जोशी खोला आयेगा ओर यदि मरी माँ का लड़का होगा तो डोटी में ही रहेगा |स्वप्न देखकर गंगू की नींद टूट जाती ओर वह भारी  मन  के साथ डोटी छोड़कर जोगी बन जाता है ओर हरिद्वार में आकर गुरु गोरखनाथ से शिक्षा दीक्षा लेता है वह बुक्सार विद्या का दुर्लभ ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है |गुरु गोरखनाथ उसे  दिव्य  ओर अनिष्ठ  रक्षक   वस्त्र प्रदान करते है ओर गोरिल देव भी  (ग्वील /गोरिया /गोलू ) उन्हे अपनी शक्ति प्रदान करते हैं |

गंगनाथ चोला धारण कर बारही जोगी  बनकर भिक्षा  मांगते मांगते देवीधुरा के बन में शीतल वृक्ष  की छावं में अपना ध्यान आसन  लगाता है | ध्यान रत जोगी को देख कर लोग उसके पास पूजा अर्चना के लिये आते हैं ओर अपने दुःख समस्या आदि का कारण निवारण पूछते हैं | धीरे धीरे गंगू सारे क्षेत्र में प्रसिद्ध   हो जाता है पर भाना  का ख्याल  उससे रह रह कर उसकी   ध्यान साधना को भंग करता रहता है | अत : वह देवीधुरा को छोड़ अलख निरंजन कहता हुआ निकल पड़ता है | राह  में चलते चलते जब राहगीर घस्यारीं   गंगू  जोगी को प्रणाम   करके उसका पता पूछते है तो वह स्वयं  को डोटी का राजकुमार बताता है ओर भाना से अपने प्रेम वियोग  की अधूरी कथा- व्यथा सुनाता है ओर भाना का पता पूछता है |घस्यारिन उसे भाना की वियोग दशा का भी वर्णन करती है ओर कहती है की भाना सुंदरी अभी तक  गंगनाथ के लिये  प्रतीक्षारत है |

घस्यारिन ये  सब बात जाकर भाना  सुंदरी को बतलाती है | अगले दिन भाना इस आश के साथ की गंगनाथ उसे पहचान ही लेगा  उससे बिना सुचना दिए ,पानी के बहाने उससे  पहली बार निहारती है ओर दोनों की यह प्रथम मिलन बेला होती है | गंगनाथ ओर भाना को जोशी दीवान के आदमी जब इस प्रकार साथ देखते हैं तो जाकर इसकी सूचना दीवान को देते हैं |फिर एक साजिश के तहत होली के दिन गंगनाथ को भंग पिला कर उसको गोरखनाथ के द्वारा प्रदान अनिष्ठ रक्षक दिव्या  वस्त्र  उतार दिए  जाते हैं  | भाना विलाप करती हुई  उसके प्राणों  की दुहाई देती रहती पर उसकी एक नहीं सुनी जाती ओर अंत में गंगनाथ को विश्वनाथ   घाट पर मौत के घाट उतार  दिया जाता है | क्रोधाग्नि में जलती भाना उनको फिटगार मारती है की उन सबका घोर अनिष्ठ होगा ओर वो पानी की बूंद बूंद के लिये तरश उठेंगे ,उन्हे अन्न का एक दाना नसीब नही होगा | क्रोध में आकर दीवान भाना को भी मौत के घाट उतार देता है |

इसके कुछ दिन बाद ही सारा जोशी खोला ओर विश्वनाथ घाट डोलने लगता है ओर वहां घोर अक्काल जैसी  स्थिति उत्पन हो जाती  है जिससे  जोशी खोला के लोग भय से काँप उठते हैं ओर गंगनाथ-भाना की पूजा कर क्षमा याचना करते हैं | और उन्हे देव रूप में स्थापित करते हैं ,तब से कुमायूं के अधिकांश क्षेत्रौं में गंगनाथ जी   की देबता रूप में  पूजा अर्चना की जाती है  उनका जागर लगाया जाता है | जिसके कुछ अंश   निम्नवत हैं :

(१) प्योंला राणि को आशीष प्राप्ति का अंश
हे भुल्लू उ उ उ उ उ उ उ उ 
सुण म्यारा गंगू उ उ उ   अब ,यो मेरी बखन अ अ अ  अ अ अ अ
यो  राजा भबै  चन्न अ   तब अ अ अ  ,बड़  दुःख हई राही   हो हो ओ ओ ओ  ओ आंह ह ह ह  अ अ
हे  भुल्लू उ उ उ उ
क्या दान करैछ  अब ,यो माता प्योंला राणी ई अ अ अ
यो गंगा नौं  की नाम  तुमुल अ अ  ,यो  गध्यार नहाल हो हो हो हो  आ आ अ अ ह ह 
इज्जा गंगा नाम  की गध्यार नयाली आंह आंह आंह ह ह
हे भुल्ली इ इ  ई ई  ई ई  ई
 ये  देबता  नाम का तुमुल ,यो ढुंगा   ज्वाड़ी  व्हाला अ  अ अ अ अ अ
कैसी कन  देखि  तुमुल अ अ अ ,  यो संतानौं  मुख अ अ अ अ अ अ   आंह ह ह ह  अ अ अ
हे भुल्ली इ ई ई ई ई
को देब रूठो सी कौला यो डोटी भगलिंग अ अ अ अ अ
हाँ क्या दान करलू भग अ अ अ अ  ,ये डोटीगढ़  मझ  हो हो हो हो अ अ अ अ
औ हो हो   डोटी भागलिंग  की आन छै  ,आंह आंह आंह आंह अ अ
हे भुल्ली ई ई ई ई ई ई
यो तुम्हरी धातुन्द एगे,  तौं डोटी भगलिंग अ अ अ अ अ अ
ये  सुणिक  सपन ऐगे अ अ अ , ओ  माता प्योंला राणी  हों हों हों हों  हां हां ह अ अ
डोटी भगलिंग  जा ,माता प्योला राणि स्वीली  सपन हेगि आंह आंह आंह ह ह
हे भुल्ली ई ई ई
 त्यार  कुड़ी का रवाडी होलो , यो सांदंण कु खुंट अ अ अ अ अ अ
सात दिन तू तो राणि ई ई ई ई ई  , यो  जल चढ़ा दीये अ अ अ अ  अ अ   
इज्जा सांदंण फूल मा जल चढई  तू  आंह आंह आंह ह ह ह
हे भुल्ली ई ई ई
सात दिन कौला  अब , यो फल खिली जाल आ आ आंह आंह आंह
यो फल आयी जालू तब अ अ ,संतान हई जाली  हो हो हो हो हो आ आ अ अ  ह ह .....
इज्जा सांदंण खुंट भटेय  कल्ल  खिलल तब संतान व्हेली आंह आंह आंह ह ह ह
हे भुल्ली ई  ई ई  ई इ
 वो माता प्योंला राणि तब ,यरणित उठी जैली आंह आंह आंह आंह आंह
रात-ब्याण बगत प्योंला आंह    क्या जल चढाली  ? हो हो हो हो हो हो हो ........

 (२) गंगनाथ की गुरु गोरखनाथ जी  से दीक्षा का अंश
ए.......तै बखत का बीच में, हरिद्वार में बार बर्षक कुम्भ जो लागि रौ।
ए...... गांगू.....! हरिद्वार जै बेर गुरु की सेवा टहल जो करि दिनु कूंछे......!
अहा.... तै बखत का बीच में, कनखल में गुरु गोरखीनाथ जो भै रईं......!
ए...... गुरु कें सिरां ढोक जो दिना, पयां लोट जो लिना.....!
ए...... तै बखत में गुरु की आरती जो करण फैगो, म्यरा ठाकुर बाबा.....!
अहा.... गुरु धें कुना, गुरु......, म्यारा कान फाडि़ दियो,
मून-मूनि दियो, भगैलि चादर दि दियौ, मैं कें विद्या भार दी दियो,
मैं कें गुरुमुखी ज बणा दियो। ओ...
दो तारी को तार-ओ दो तारी को तार,
गुरु मैंकें दियो कूंछो, विद्या को भार,
बिद्या को भार जोगी, मांगता फकीर, रमता रंगीला जोगी,मांगता फकीर।
(३) मृत्यु उपरान्त जोशी खोला में गंगनाथ और भाना की आत्मा आहवान का अंश 
      (साभार :हेम सिंह बिष्ट ,नवोदय  पर्वतीय कला केंद्र ,पिथोरागढ़ )

मानी जा  हो डोटी का  कुंवर अब 
मानी जा  हो रूपवती भानाअब
जागा हो डोटी का  कुंवर अब
जागा हो रूपवती भाना अब
प्राणियों का रणवासी  छोडियो  अब
छोडियो डोटी वास
माँ का प्यार पिता का द्वार -२ , छोडियो तू ले आज
भभूती  रमाई गंगनाथा रे -२
डोटी का कुंवर गंगनाथा रे -२
रूपवती भाना गंगनाथा रे -२
ताज क्यूँ उतारी दियो नाथा रे -२
जोगी का भेष लियो  नाथा रे -२
भभूती  रमाई गंगनाथा  रे   -२

अंतत : उत्तराखंडी लोक संस्कृति  विरासत के अथाह  सागर के इस बूंद का अध्यन करने पर यह  अहसास होता है की उत्तराखंड  हिमालय में
जागर  लोकगीतों का दुर्लभ सांस्करतिक और साहित्यिक ज्ञान पहाड़ -पहाड़ पर बिखरा पड़ा  है जिसके  मर्मज्ञ लोक कलाकार धीरे धीरे कम होते जा रहे हैं जिनसे लोकगीतों की यह अमूल्य निधि विलुप्त होने के कगार  पर आ खड़ी हुयी जिसके लोक संरक्षण और संवर्धन के लिये सम्बंधित तात्कालिक सामाजिक पीढी का इन सभी लोकगीतों को समझने और एक सामाजिक ,सांस्करतिक और ऐतिहासिक परिपेक्ष में इनके संकलन  -अध्ययन  तथा अवलोकन की नितांत आवश्यकता  है |

 लेखक  - : (गीतेश सिंह नेगी , हिमालय की गोद से ,सिंगापूर प्रवास से )
        

Saturday, May 7, 2011

इतिहास के झरोखों से

इतिहास के झरोखों से :  डोटी गढ़  का संक्षिप्त इतिहास और उसकी ऐतिहासिक और सामाजिक  महता

उत्तराखंड के जागर लोकगीत  और लोक गाथाएँ  स्वयं में अतीत के असंख्य ऐतिहासिक घटनाओं को  अपने गर्भ में समेटें हुए है जिनमे पुरातन हिमालयी संस्कृति के सर्जन और विघटन से भरे  असंख्य पन्ने समाये हुए है | ये लोकगीत इस हिमालयी  राज्य की सनातन संस्क्रति का उद्घोष  तो करते ही इसके साथ साथ एक ओर ये प्राचीन वीर भड़ो का यशोगान भी करते है तो वहीं दूसरी और ये लोकगीत और लोक गाथाएँ इतिहास प्रेमी  लोगौं के लिये काल चक्र परिवर्तन के रूप में अतीत  के अनछुए - बिखरे घटनाक्रम  को समझने - सजोने और एक विरासत के रूप में लोक इतिहास के क्रम में जोडने में  प्रमुख भूमिका निभाते आ रहे हैं  | 

इतिहासकारों के लिये भले ही ये ऐतिहासिक रूप से शोध के विषय हो परन्तु ये  समस्त लोकगीत और गाथाएँ उत्तराखंड के जनमानस के मानस पटल पर उनके असंख्य  आराध्य देबी-देबतौं   की आराधना -आह्वाहन  के मंत्रों ,लोकगीतों ओर साहित्यिक   धरोहर ओर  उनकी आस्था के बीज रूप में भी बिराजमान है और उनके समस्त सामाजिक क्रियाकलापौं,विवाह -पूजा संस्कारों , तीज -त्योहारौं,थोल म्यालौं आदि   में रच बस गए है |

इन्ही लोकगीत और लोक गाथाओं  विशेषकर गोरिल (ग्वील -गोलू -गोंरया  जो की चम्पावत  के  सूरज वंशी राजा झालराय का पुत्र  था और इतिहासिक काल में धामदेव -विरमदेव और हरु सेम के समकालिक  माना जाता है ) की गाथाओं और गीतों में  ,राजुला मालुशाही और गडु सुम्याल आदि में भी  डोटी गढ़ का अनेक बार उल्लेख    मिलता है | जो प्राचीन काल में डोटी गढ़ की इसकी ऐतिहासिक महता को सार्थक करता है |

डोटी शब्द  की उत्पति के सम्बन्ध  में दो  धारणायें व्यापत है | पहली धारणा के अनुसार इसकी उत्पति ‘Dovati’ ( which means the land area between the confluences of the two rivers ) sey  हुई है  जबकि दूसरी धारणा (DEVATAVI= DEV+AATAVI or AALAYA (Dev meaning the Hindu god and aatavi meaning the place of re-creation, place of attaining a meditation in Sanskrit) से इसकी उत्पति मानी गयी है |
 
डोटी गढ़ जो की नेपाल का एक सुदूर पश्चिम क्षेत्र है  , तथा उत्तराखंड के कुमौं  क्षेत्र की काली नदी तथा नेपाल की  कर्णाली नदी के बीच बसा है वर्तमान डोटी मंडल में नेपाल के सेती और महाकाली क्षेत्र के ९ जिल्ले कर्मश : धारचूला ,बैतडी ,डडेलधुरा ,कंचनपुर ( महाकाली में  ) और  डोटी,कैलाली,बझांग,बाजुरा और  अछाम  (सेती में )  हैं |

लोकगीतों ,लोककथाओं और उत्तराखंड और नेपाल के लोक इतिहास के अनुसार  डोटी गढ़ उत्तराखंड का  एक प्राचीन राज्य  था  जो सुदर नेपाल तक फैला हुआ था जो सन ११९१ तथा सन १२२३  में उत्तराखंड के  कत्युर राजवंश पर  खश  आक्रमण कारी अशोका- चल्ल और क्राचल्ल  देव आक्रमण के फलस्वरूप १३०० में स्थापित हुआ  ,अशोल चल बैतडी का ही महायानी बोध राजा (Atkinson  ,गोपेश्वर - बाड़ाहाट (उत्तरकाशी ) त्रिशूल अभिलेख )  था जबकि क्राचल्ल देव नेपाल के पश्चिम भाग डोटी का अधिपति था |
(दुलू ताम्रभिलेख  के अनुसार)  |

 डोटी  कत्युरौं के उन् ८ प्रमुख भागौं (बैजनाथ-कत्युर ,द्वाराहाट ,डोटी ,बारामंडल ,अस्कोट ,सिरा ,सोरा ,सुई (काली कुमोउन) में से एक  था  जो खश  आक्रमण  के कारण हुए  कत्युर साम्राज्य के विघटन के बाद  स्थापित  हुआ था |

विजय के पश्चात खश  आक्रमण कारी अशोका- चल्ल ने गोपेश्वर  में बैतडी धारा / वैतरणी धारा में पदमपाद राजयातन (प्रासाद ) का भी निर्माण किया था और उसे  अपनी राजधानी बनाया था जहाँ अब अवशेष  रूप में केवल बोध शैली के एक  भैरव मंदिर सहित कुछ अन्य मंदिर ही मौजूद है | उसने यहाँ   सन १२०० तक राज किया और इस  समय अंतराल में उसने बोध गया में बुद्ध मूर्ति की प्रतिष्ठा भी की  जो की  उसका मुख्या अभियान माना जाता है | जिसका उल्लेख गोपेश्वर त्रिशूल   में  "दानव भूतल स्वामी " के रूप में मिलता है (दानव  भूतल  गढ़वाल कुमोउन का दानपुर क्षेत्र,नंदा  जात का  प्रसिद्ध भड लाटू दाणु यहीं का बीर भड था जिसकी पूजा नंदा राज जात में होती है   )

अशोक चल्ल ने कर वसूली के लिये यहाँ बिभिन्न रैन्का चौकियों/चबूतरों का निर्माण भी  किया जिसके उतराधिकारी कैन्तुरी  रैन्का बाद में यहाँ शासन करते रहे (रैन्का = राजपुत्र ) इसके अतरिक्त प्रसिद्ध कैन्तुरी  राजा  ब्रहम देव (विरम देव ) जिसे गढ़वाली लोक गाथा गढ़ु  सुम्याल में "रुदी "   नाम से जाना जाता है और  जिसका शासन  काल सन १३७०-१४४३ ई समझा जाता है  ने महाकाली  क्षेत्र के कंचनपुर जिले में "ब्रहमदेव की मंडी " की स्थापना  भी की थी | 

क्राचल्ल  देव  जो की पश्चिम  नेपाल के डोटी गढ़ का अधिपति था और एक महायानी बोध था ने सन १२३३ मे उत्तराखंड के यत्र - तत्र   बिखरे कत्युरी राज्य पर आक्रमण किया जिसका उल्लेख दुलू  (क्राचल्ल  देव  का पैत्रेक राज्य ) के लेख में मिलता है | विजय के पश्चात  क्राचल्ल  देव ने इस भाग को दस सामन्तौं (जिन्हे मांडलिक कहा जाता था )के अधीन सौंपकर दुलू  लौट गया |

क्राचल्ल  देव द्वारा नियुक्त ये   दस मांडलिक सामंत निम्नवत थे :

(१) श्री बल्ला देव मांडलिक (२) श्री बाघ  चन्द्र मांडलिक (३) श्री श्री अमिलादित्य राउतराज    (४) श्री जय सिंह मांडलिक (५) श्री जाहड़देव मांडलिक
(६) श्री जजिहल देव मांडलिक (७) श्री चन्द्र  देव मांडलिक(करवीरपुर ,बैजनाथ अभिलेख ,१२३३ ई  ) (८) श्री वल्लालदेव मांडलिक (९) श्री विनय चन्द्र (१०) श्री मुसादेव मांडलिक

कालांतर में   कत्युरी राज्य के पश्चिम  भाग  अर्थात काली कुमौं में चन्द शक्ति  का उदय  हुआ उधर  गढ़वाल -कुमौं - नेपाल  के तराई पर यवनों के आक्रमण शुरू  हो चुके थे |

सन १४४५-५० ई  के आसपास डोटी राजपरिवार  का छोटा राजकुमार नागमल्ल (सिरा का रैन्का राजा ) ने अपने बडे भाई अर्जुन देव  से राजगद्दी  छीन कर अपनी शक्ति का विस्तार किया | अर्जुन देव को चन्द राजा कलि कल्याण चन्द्र की शरण में जाना पड़ा | कलि कल्याण चन्द्र की जानता उसके बर्ताव  से खुश नहीं थी,अस्तु राजकुमार भारती चन्द (कलि कल्याण चन्द का भतीजा     ने विद्रोही कुमौनियों को साथ मिलकर अपना अलग संघ बना डाला और डोटी पर छापा  मरने निकल पड़ा |
(Atkinson , के अनुसार भारती चन्द्र ने अपना   शिविर बाली चोकड़    नामक  स्थान  पर (काली नदी के तट पर) लगया था |

कालान्तर में जब डोटी के राजा ने काली कुमोउन पर आक्रमण कर दिया तो कटेहर  नरेश (संभवतया हरु सैम ) ,मुसा सोंन   के वंसज तथा सोंनकोट के पैक मैद सोंन की मदद से उन्होने भीषण  युद्ध में  डोटी के  नागमल्ल को परास्त कर दिया |

डोटी के रैन्का  :

निरंजन  मल्ला  देव  ने १३ वी  सदी के आस पास ,कत्युर साम्राज्य के अवसान के बाद डोटी राज्य की स्थापना की | वह संयुक्त कत्युर राज्य के अंतिम कत्युरी राजा  का पुत्र था | डोटी के राजा को  रैन्का  या रैन्का महाराज भी कहा जाता था |

इतिहास कारौं ने निम्न रैन्का महाराजौं की प्रमाणिक  पुष्टि की है :

निरंजन  मल्ल  देव  (Founder of Doti Kingdom), नागी   मल्ल  (1238), रिपु  मल्ल  (1279), निरई   पाल  (1353 may be of Askot and his historical evidence of 1354 A.D has been found in Almoda), नाग  मल्ल  (1384), धीर  मल्ल  (1400), रिपु  मल्ल  (1410), आनंद  मल्ल  (1430), बलिनारायण  मल्ल  (not known), संसार  मल्ल  (1442), कल्याण  मल्ल  (1443), सुरतान    मल्ल  (1478), कृति  मल्ल (1482), पृथिवी  मल्ल  (1488), मेदिनी  जय  मल्ल   (1512), अशोक  मल्ल    (1517), राज  मल्ल  (1539), अर्जुन  मल्ल / शाही   (not known but he was ruling Sira as Malla and Doti as Shahi), भूपति  मल्ल / शाही  (1558), सग्राम   शाही  (1567), हरी  मल्ल /शाही  (1581 Last Raikas King of Sira and adjoining part of Nepal), रूद्र  शाही  (1630), विक्रम  Shahi  (1642), मान्धाता  शाही  (1671), रघुनाथ  शाही  (1690), हरी  शाही  (1720), कृष्ण  शाही  (1760), दीप   शाही  (1785), पृथिवी  पति   शाही  (1790, 'he had fought against Nepali Ruler (Gorkhali Ruler) with British in 1814 A.D').

इतिहासकार डबराल के  अनुसार कत्युरी राजा  त्रिलोक पाल देव जिसकी  शासन  अवधि १२५०-७५ ई ० मानी जाती है का राज्य डोटी से अस्कोट ,दारमा,जौहार,सोर ,सीरा,दानपुर ,पाली पछाउ - बारामंडल -फल्दाकोट तक फैला हुआ था | इतिहासकारों  के अनुसार राजा निरंजन देव ने अपने भाई अभय पाल की मदद से असकोट को जीत लिया था उसने कुंवर धीरमल्ल को सीरा ,धुमाकोट   और चम्पावत का शासक नियुक्त किया उसने अपने छोटे पुत्र को द्वाराहाट(पाली पछाउ ) का और बडे पुत्र को चम्पावत सुई  का मांडलिक बनाया जो कालांतर में डोटी का राजा बना |

कैन्तुरी   इतिहास में प्रीतम देव /पृथ्वीपाल /पृथ्वीशाही का भी  उल्लेख मिलता है  जो आसन्ति - वासंती देव पीड़ी के ७ वे  नरेश अजब राय  (पाली पछाउ ) के पुत्र गजब राय  (द्वाराहाट का कैन्तुरी राजा ) के पुत्र सुजान देव का छोटा भाई था  जिसने रानीबाग के भयंकर युद्ध में तुर्क सेना को परस्त किया था | पिथोरागढ़   उसका एक प्रमुख गढ़ था  और उसकी एक पत्नी मान सिंह की बेटी गांगला देई,दूसरी धरमा देई और तीसरी धामदेव की माता और हरिद्वार के निकट  के पहाड़ी  भूभाग के मालवा खाती  क्षत्रिय राजवंशी झहब  राज की पुत्री थी जिसे    "रानी जिया " और  "मौला देई " के नाम से जाना जाता था | प्रीतम देव शत्रु  का विनाश  करने वाला प्रतापी राजा था  जिसका वर्णन जागर गीतों में ( "जै पृथ्वीपाल ने पृथ्वी हल काई "  ) मिलता है  |

रानी जिया पृथ्वीपाल की मृत्यु के पश्चात गौला नदी के समीप सयेदौं से हुए युद्ध में विजय के पश्चात मृत्यु को प्राप्त हुई थी जहाँ आज भी उसकी समाधि  "चित्रशीला " नाम से उत्तरायणी मेले  के दिन पूजी जाती है | जिया रानी का पुत्र धामदेव था जो बड़ा प्रतापी  और  शक्तिशाली राजा था और  कत्युरी राज के इतिहास में उसके  शासन काल को  स्वर्णिम युग की संज्ञा दी जाती है | राजुला - मालूशाही की प्रसिद्ध लोकगाथा का नायक मालूशाही , राजा धामदेव का ही पुत्र था |

प्रसिद्ध गीत " तिलै धारू बोला  "   जो तिलोतमा पर  विरमदेव के बलपूर्वक अधिकार की गाथा को अपने गर्भ में लिये हुए है भी डोटी गढ़ से ही सम्बन्ध  रखती है क्यूंकि तिलोतमा दुलू पधानी और रिश्ते में  विरम देव की मामी थी |
विरमदेव और  चन्द राजा विक्रम  के बीच का  जवाड़ी सेरा का युद्ध जिसमे विरम देव  ने धामदेव के साथ मिलकर  चन्द राजा के पुत्र की बारात जो की डोटी की राजकुमारी  विरमा डोटियालणी  का डोला ले कर आ रही थी जवाड़ी सेरा में लुट ली थी क्यूंकि विक्रम चन्द ने उसकी अनुपस्थिति  में उसका गढ़ लखनपुर लुटा था और विरमदेव की सात वीरांगना पुत्रियाँ उससे युद्ध करते हुए वीरगति  को प्राप्त हुई थी | विरमदेव विरमा डोटियालणी का डोला लुट कर लखनपुर ले आया था और  युद्ध में चन्दराजा की हार हुई जिसका उल्लेख लोकगीतों  में मिलता इस  प्रकार से मिलता है :

 "जै निरमा ज्यू  को आल  बांको ढाल बांको
 तसरी कमाण बांकी -जीरो (जवाड़ी) सेरो बाको "


इतिहासकारों  के अनुसार संन  १७९० के गोरखा विस्तार के दौरान सेती नदी के तट का नरी डंग  क्षेत्र में नेपाली  सेना का और धुमाकोट  क्षेत्र गोरखाली के विरुद्ध डटी  डोटी सेना का  शिविर था |

भाषा और संस्कृति :

डोटियाली या डुट्याली  तथा कुमोउनी , डोटी( पश्चिम नेपाल  क्षेत्र सहित ) में प्रचलित स्थानीय भाषाएं है | डोटियाली या डुट्याली जो की कुमोउनी भाषा से समानता  रखती है और इंडो यूरोपियन परिवार की एक भाषा है को महापंडित राहुल सांकृत्यान ने  कुमोउनी  भाषा की  एक उप बोली माना उनके अनुसार यह डोटी में कुमोउन के कन्तुरौं के साथ  डोटी में आई जिन्होने संन १७९० तक डोटी पर राज   किया था | परन्तु नेपाल में इससे  एक नेपाली बोली के रूप मे जाना जाता है समय समय पर डोटियाली या डुट्याली भाषा  को नेपाल की राष्ट्रीय  भाषा के रूप मे मान्यता देने की मांग उठती  रही है .  गोरा  (Gamra) कुमौनी  होली , बिश्पति , हरेला , रक्षा   बन्द्हब  (Rakhi) दासहिं , दिवाली , मकर  संक्रांति   आदि डोटी क्षेत्र के प्रमुख  त्यौहार रहे हैं .

पारम्परिक लोकगीत  :  छलिया , भाडा , झोरा  छपेली , ऐपन , जागर  डोटी संस्कृति के प्रमुख  अंग है | जागर कैन्तुरी  काल की लोक कथाओं को उजागर करने वाला मुख्या लोक गीत   हैं |
Jhusia Damai ( झूसिया दमाई ) कुमोउनी संस्कृति के एक प्रमुक जागरी और लोकगायक थे जिनका जन्म  १९१३ में   रणुवा  धामी  बैतडी जिल्ले के बस्कोट ,नेपाल में हुआ  था |

आज भी गढ़वाल -कुमौं के अनेक गोरिल जागर गीतों तथा गाथाओं में  में डोटी का उल्लेख मिलता है ,जैसे की

जै गुरु-जै गुरु
माता पिता गुरु देवत
तब तुमरो नाम छू इजाऽऽऽऽऽऽ
यो रुमनी-झूमनी संध्या का बखत में॥
तै बखत का बीच में,
संध्या जो झुलि रै।
बरम का बरम लोक में, बिष्णु का बिष्णु लोक में,
राम की अजुध्या में, कृष्ण की द्वारिका में,
यो संध्या जो झुलि रै,
शंभु का कैलाश में,
ऊंचा हिमाल, गैला पताल में,
डोटी गढ़ भगालिंग में
कि रुमनी-झुमनी संध्या का बखत में,
पंचमुखी दीपक जो जलि रौ,
स्योंकार-स्योंनाई का घर में, सुलक्षिणी नारी का घर में,
जागेश्वर-बागेश्वर, कोटेश्वर, कबलेश्वर में,
हरी हरिद्वार में, बद्री-केदार में,
गुरु का गुरुखण्ड में, ऎसा गुरु गोरखी नाथ जो छन,
अगास का छूटा छन-पताल का फूटा छन,
सों बरस की पलक में बैठी छन,
सौ मण का भसम का गवाला जो लागीरईए
गुरु का नौणिया गात में,
कि रुमनी- झुमनी संध्या का बखत में,
सूर्जामुखी शंख बाजनौ,उर्धामुखी नाद बाजनौ।
कंसासुरी थाली बाजनै, तामौ-बिजयसार को नगाड़ो में तुमरी नौबत जो लागि रै,
म्यारा पंचनाम देबोऽऽऽऽऽऽ.........!
अहाः तै बखत का बीच में,
नौ लाख तारों की जोत जो जलि रै,
नौ नाथन की, नाद जो बाजि रै,
नौखण्डी धरती में, सातों समुन्दर में,
अगास पाताल में॥
कि ऎसी पड़नी संध्या का बखत में,
नौ लाख गुरु भैरी, कनखल बाड़ी में,
बार साल सिता रुनी, बार साल ब्यूंजा रुनी,
तै तो गुरु, खाक धारी, गुरु भेखधारी,
टेकधारी, गुरु जलंथरी नाथ, गुरु मंछदरी नाथ छन, नंगा निर्बाणी छन, खड़ा तपेश्वरी छन,
शिव का सन्यासी छन, राम का बैरागी छन,
कि यसी रुमनी-झुमनी संध्या का बखत में,
जो गुरु त्रिलोकी नाथ छन, चारै गुरु चौरंगी नाथ छन,
बारै गुरु बरभोगी नाथ छन, संध्या की आरती जो करनई।
गुरु वृहस्पति का बीच में।
.......कि तै बखत का बीच में बिष्णु लोक में जलैकार-थलैकार रैगो,
कि बिष्णु की नारी लक्ष्मी कि काम करनैं,
पयान भरै। सिरा ढाक दिनै। पयां लोट ल्हिने,
स्वामी की आरती करनै।
तब बिष्णु नाभी बै कमल जो पैद है गो,
तै दिन का बीच में कमल बटिक पंचमुखी ब्रह्मा पैड भो,
जो ब्रह्मा-ले सृष्टि रचना करी, तीन ताला धरती बड़ै,
नौ खण्डी गगन बड़ा छि।
....कि तै बखत का बीच में बाटो बटावैल ड्यार लि राखौ,
घासिक घस्यार बंद है रौ, पानि को पन्यार बंद है रौ,
धतियैकि धात बंद है रै, बिणियेकि बिणै बंद है रै,
ब्रह्मा वेद चलन बंद है रो, धरम्क पैन चरण बंद है गो,
क्षेत्री-क खण्ड चलन बन्द है गो, गायिक चरण बन्द है गो,
पंछीन्क उड़्न बंद है गो, अगासिक चडि़ घोल में भै गईं,
सुलक्षिणी नारी घर में पंचमुखी दीप जो जलण फैगो........
......कि तै बखत का बीच में संध्या जो झुलनें,
दिल्ली दरखड़ में, पांडव किला में,
जां पांच भै पाण्डवनक वास रै गो,
संध्या जो झूलनें इजूऽऽऽ हरि हरिद्वार में, बद्री केदार में,
गया-काशी,प्रयाग, मथुरा-वृन्दावन, गुवर्धन पहाड़ में,
तपोबन, रिखिकेश में, लक्ष्मण झूला में,
मानसरोबर में नीलगिरि पर्वत में......।
तै तो बखत का बीच में, संध्या जो झुलनें इजू हस्तिनापुर में,
कलकत्ता का देश में, जां मैय्या कालिका रैंछ,
कि चकरवाली-खपरवाली मैय्या जो छू, आंखन की अंधी छू,
कानन की काली छू, जीभ की लाटी छू,
गढ़ भेटे, गढ़देवी है जैं।
सोर में बैठें, भगपती है जैं,
हाट में बैठें कालिका जो बणि जैं।
पुन्यागिरि में बैठें माता बणि जैं,
हिंगलाज में भैटें भवाणी जो बणि जैं।
....कि संध्यान जो पड़नें, बागेश्वर भूमि में, जां मामू बागीनाथ छन।
जागेशवर भूमि में बूढा जागीनाथ रुनी,
जो बूढा जागी नाथन्ल इजा, तितीस कोटि द्याप्तन कें सुना का घांट चढ़ायी छ,
सौ मण की धज चढ़ा छी।
संध्या जो पड़ि रै इजाऽऽऽ मृत्युंद्यो में, जां मृत्यु महाराज रुनी, काल भैरव रुनी।
तै बखत का बीच में संध्या जो झुलनें,
सुरजकुंड में, बरमकुंड में, जोशीमठ-ऊखीमठ में,
तुंगनाथ, पंच केदार, पंच बद्री में, जटाधारी गंग में,
गंगा-गोदावरी में, गंगा-भागीरथी में, छड़ोंजा का ऎड़ी में,
झरु झांकर में, जां मामू सकली सैम राजा रुनी,
डफौट का हरु में, जां औन हरु हरपट्ट है जां, जान्हरु छरपट्ट है जां.......।
गोरियाऽऽऽऽऽऽ दूदाधारी छै, कृष्ण अबतारी छै।
मामू को अगवानी छै, पंचनाम द्याप्तोंक भांणिज छै,
तै बखत का बीच में गढी़ चंपावती में हालराई राज जो छन,
अहाऽऽऽऽ! रजा हालराई घर में संतान न्हेंतिन,
के धान करन कूनी राजा हालराई.......!
तै बखत में राजा हालराई सात ब्या करनी.....संताना नाम पर ढुंग लै पैद नि भै,
तै बखत में रजा हालराई अठुं ब्या जो करनु कुनी,
राजैल गंगा नाम पर गध्यार नै हाली, द्याप्ता नाम पर ढुंग जो पुजिहाली,......
अहा क्वे राणि बटिक लै पुत्र पैद नि भै.......
राज कै पुत्रक शोकै रैगो
एऽऽऽऽऽ राजौ- क रौताण छिये......!
एऽऽऽऽऽ डोटी गढ़ो क राज कुंवर जो छिये,
अहाऽऽऽऽऽ घटै की क्वेलारी, घटै की क्वेलारी।
आबा लागी गौछौ गांगू, डोटी की हुलारी॥
डोटी की हुलारी, म्यारा नाथा रे......मांडता फकीर।
रमता रंगीला जोगी, मांडता फकीर,
ओहोऽऽऽऽ मांडता फकीर......।
ए.......तै बखत का बीच में, हरिद्वार में बार बर्षक कुम्भ जो लागि रौ।
ए...... गांगू.....! हरिद्वार जै बेर गुरु की सेवा टहल जो करि दिनु कूंछे......!
अहा.... तै बखत का बीच में, कनखल में गुरु गोरखीनाथ जो भै रईं......!
ए...... गुरु कें सिरां ढोक जो दिना, पयां लोट जो लिना.....!
ए...... तै बखत में गुरु की आरती जो करण फैगो, म्यरा ठाकुर बाबा.....!
अहा.... गुरु धें कुना, गुरु......, म्यारा कान फाडि़ दियो,
मून-मूनि दियो, भगैलि चादर दि दियौ, मैं कें विद्या भार दी दियो,
मैं कें गुरुमुखी ज बणा दियो। ओ...
दो तारी को तार-ओ दो तारी को तार,
गुरु मैंकें दियो कूंछो, विद्या को भार,
बिद्या को भार जोगी, मांगता फकीर, रमता रंगीला जोगी,मांगता फकीर।

उपरोक्त के आधार पर कहा जा सकता है की  डोटी गढ़ का उल्लेख उत्तराखंड और नेपाल  के प्राचीन इतिहास के  एक साक्षी  भूखंड के रूप में होने के साथ साथ ही यहाँ के देबी-देबतौं जो की प्रसिद्ध  ऐतिहासिक वीर भड  थे ,के  अदम्य साहस , वीरता ,प्रेम-प्रसंग ,विद्रोह  की लोक-गाथाओं और लोकगीतों में प्रमुख रूप से मिलता है और उनकी   ऐतिहासिक भूमिका में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है |

संदर्भ ग्रन्थ : उत्तराखंड के वीर भड , डा ० रणबीर सिंह चौहान
                    ओकले तथा गैरोला ,हिमालय की लोक गाथाएं 
                    यशवंत सिंह कटोच -मध्य  हिमालय का पुरातत्व

विशेष आभार : डॉ. रणबीर सिंह चौहान, कोटद्वार  (लेखक और इतिहासकार ), माधुरी रावत जी  कोटद्वार
स्रोत : म्यार ब्लॉग हिमालय की गोद से (सिंगापूर प्रवास से )           
          (http://geeteshnegi.blogspot.com/)

Thursday, May 5, 2011

गढ़वाली कबिता : लाटू देबता




झूठा सच ,
खत्याँ बचन ,
बिस्ग्यां अश्धरा ,
खयीं सौं करार ,
और कुछ सौ एक रुपया उधार ,
बस इत्गा ही छाई वेकु मोल
जै खुण लोग लाटू बोल्दा छाई ,
जै थेय कुई बी घच्का सकदु छाई ,
कुई बी खैड्या सकदु छाई ,
घंट्याई सकदु छाई ,
थपडयाई सकदु छाई ,
अट्गायी और उन्दू लमडाई सकदु छाई ,
निर्भगी स्यार पुंगडौं मा म्वाल ध्वल्दा -ध्वल्दा ,
सरया गौं का खाली भांडा भौरदा -भौरदा ,
लोगों का ठंगरा -फटला सरदा -सरदा ,
घास -लखुडौं का बिठ्गा ल्यान्दा -ल्यान्दा ,
और ब्यो -कारिज मा जुठा भांडा मुज्यान्दा -मुज्यान्दा ,
ब्याली अचाणचक से सब्युन थेय छोडिकी चली ग्या,
सदनी खुण ,
बिचरल ना कब्भि कै की शिकैत काई,
ना कब्भि कै खुण बौन्ला बिटायी,
ना  कब्भि कै खुण आँखा घुराई ,
और ना कब्भि कै की कुई चीज़ लुकाई ,
बस ध्वाला छीं त सदनी ,
द्वी बूंदा अप्डी लाचारी का,
अप्डी मज़बूरी का,
सुरुक -सुरुक,
टुप- टुप
यखुल्या -यखुली,
पिणु राई नीमा की सी कूला,
सार लग्युं राई उन्ह द्वी मीठा बचनो का,
जू नि व्हेय साका ,
कब्भि वेका अपणा,
आज सरया गौं का मुख फर चमक्ताल सी प्वड़ी चा ,
कुई बुनू चा बिचारु जड्डल म्वार ,
कुई बुनू चा भूखल ,
सब्हियों खुण सोच प्व़ाड़याँ छीं अफ- अफु खुण ,
और बोलंण लग्यां छीं एक दुसर मा
 हे राम धाईं  - क्या म्यालु नौनु छाई
बिचारु लाटू देबता व्हेय ग्याई !
बिचारु लाटू देबता व्हेय ग्याई !
बिचारु लाटू देबता व्हेय ग्याई !

रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ( सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार सुरक्षित,५-४-११)

Saturday, March 26, 2011

गढ़वाली कविता : म्वाला का महादेव

बिराली कन्नी छीं रक्खवली दुधा की
स्याल  बणयाँ छीं यक्ख बाघ
लोकतंत्र कु हुणु च यक्ख
साखियुं भटेय  सदनी  बलात्कार


जक्ख  जनता रैन्द बन्णी  म्वाला कु महादेव
वक्ख नेता -ठेक्कादरू  का रैंदी सदनी धन भाग 
बिजली खायी ,पाणि खायी, खायी युंल रोजगार
लग्यां छीं लुटण मा अज्काळ, त्यारू पहाड़ ,म्यारु पहाड़ 


दिन ग्यें,महिना  ग्यें,बीती ग्यें दस साल
सत्ता बदल ,सरकार बदल ,दगडी बदलीं ठेक्कदार
बदलीं  व्होली दुनिया म्यार भां से चाहे  सरया 
पर नि बदला  निर्भगी गौं -पहाड़ , त्यारा  जोग भाग

सुपिन्या बैठियां छीं स्वील ,यक्ख  साखियुं भटेय
उठ जान्द डाव बगत बगत मेरी  भी आश थेय  
भटकीं छीं विगास योजना यक्ख
आखिर बक्खा  जान्द भ्रस्टाचार किल्लेय  उन्थेय झट ? 

प्रधान -पटवारी गौं खा ग्यीं
सड़क चक- डाम ठेक्कदार खा ग्यीं
विगास क़ि गंगा सुख ग्या  ऱोय-ऱोय क़ी 
डाम भी डसणा छीं  अब बल यक्ख  गूरोव बणिक़ी   

मिंढका  छीं लगाणा अज्काळ  यक्ख  हैल बल
बांजी राजनीति की पुंगडियुं मा
बुतणा छीं  बीज बेरोजगरी कु  चटेली क़ि   
हमरि हिम्वली काँठीयूँ  मा

 
ज्वनि बुगणि चा बल यक्ख उन्दु   मैदानुं मा
गंगा जी  से भी तेज 
 गौं -पहाड़ छोड़ क़ी
बस ग्यीं सब परदेश
गौं -पहाड़ छोड़ क़ी , बस ग्यीं सब परदेश
गौं -पहाड़ छोड़ क़ी , बस ग्यीं सब परदेश

               
रचनाकार : गीतेश सिंह  नेगी  ( सिंगापूर प्रवास से ,सर्वाधिकार सुरक्षित )